विशुद्ध चक्र के अनुभव

विशुद्ध चक्र की यात्रा

   विषय सूची

1-       काले सर्प के फन के ऊपर एक अर्ध नग्न लड़की

2-       आकाशीय बंगला

3-       तीन लोकों की यात्रा

4-       जब मैंने सोहम मंत्र पर ध्यान दिया तब क्या हुआ?

5-       हमारे 25 स्वरूप

6-       चलते हुए बिस्तर

7-       चलती हुई कुंडलिनी का जंक्शन

8-देवताओं के वाहन

काले सर्प के फन पर एक अर्ध नग्न लड़की

रात्रि के वक्त ध्यान में मैंने एक काले सर्प को जमीन पर अपना फन फैलाए हुए देखा, अचानक उस काले सर्प के फन के ऊपर एक अर्ध नग्न लड़की प्रकट हो गई। उस लड़की का बक्षस्थल एक सफेद कपड़े की पट्टी से कई बार कसकर लपेटा हुआ था तथा उसकी कमर में भी उसके घुटनों तक एक सफेद कपड़ा लिपटा हुआ था। उसका बाकी का बदन पूरा खुला हुआ था।

उस लड़की ने प्रकट होने की कुछ देर बाद हाथ जोड़कर अपने इष्ट देव को प्रणाम किया और गायब हो गई। इसके बाद हमारी दूसरी यात्रा शुरू हो गई।

आकाशीय बंगला

ध्यान की अवस्था में अब हमारे सामने पूरा आकाश दिखाई दे रहा था। अचानक हमारे सामने आकाश के दाएं बाएं दोनों छोरों पर जो बड़े-बड़े लट्ठे अपने आप प्रकट हो गए और उन लट्ठों के ऊपर टीन जैसी चादरे जिनसे बंगले छाए जाते हैं वह पढ़ना शुरू हो गई और इसके बाद हमारे सामने बाएं लट्ठे से लेकर दाएं लट्ठे तक पूरे आकाश में एक बहुत बड़ा बंगला बना हुआ दिखाई दे रहा था।

मैं इस आकाशीय बंगले को टकटकी लगाकर देख रहा था। धीरे-धीरे उस बंगले का आकार घटने लगा तथा घटते घटते वह एक छोटे से दो या तीन कमरे के बंगले में परिवर्तित हो गया। उन कमरों के बाहर आकाशी बंगले की तरह ही टीन की चादर पड़ी हुई थी। उस कमरे के अंदर एक रोशनी हो रही थी जो कमरे के बाहर तक फैल रही थी। वह रोशनी लाल रंग की हो रही थी उस लाल रंग की रोशनी के कारण कमरे के बाहर की जमीन लाल रंग की दिखाई दे रही थी।

मैं विचार करता रहा कि शायद सर्प वाली कुंडलिनी देवी का यही मकान है जो कि आकाशीय बंगले में भी परिवर्तित हो सकता है और छोटे बंगले में भी दिखाई दे सकता है। हमारा अनुमान था कि इस कमरे से कोई देवी निकल कर बाहर आएगी और हमें वह भीतर का कमरा दिखाएगी लेकिन भीतर से कोई भी निकल कर नहीं आया कुछ देर बाद वह कमरा भी गायब हो गया तथा दृश्य बदल गया।

तीन लोकों की यात्रा

जिस समय कुंडलिनी हमें ऊपर के लोकों की यात्रा करवा रही थी उस समय आसमान में भी घनघोर बादल छाए हुए थे तथा बरसात भी हुई थी रात में भयानक अंधेरा था बाहर का अंधेरा या प्रकाश कुंडलिनी के अंदर दिखने वाले दृश्यों पर भी असर डालता है। प्रकाश होने पर दृश्य स्पष्ट दिखाई देते हैं लेकिन अंधेरा होने पर दृश्य भी ऐसे दिखाई देती है जैसे रात के अंधेरे में वीडियो बनाया गया हो इसका कारण हमारे ख्याल से शायद यही है कि मस्तक के जिस हिस्से में कुंडलिनी के दृश्य चल रहे होते हैं आंखें बंद करने पर भी बाहर के प्रकाश भीतर भी पहुंच जाता है जिस प्रकार दिन में कमरा बंद करने पर भी कमरे के भीतर दिखाई देता है इसी प्रकार मस्तक के अंदर चल रही फिल्म भी प्रकाश में स्पष्ट दिखाई देने लगती है। लेकिन सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि कुंडलिनी के दृश्य रात में ही अधिक दिखाई देते थे। और अंधेरे का असर तीसरे नेत्र द्वारा दृश्य देखने पर भी पड़ता था।

जो 3 लोक हमें दिखाए गए, उन लोकों का केवल हमें बाहरी बर्फीला क्षेत्र ही दिखाया गया वहां पर हमें कोई आदमी या अन्य जीव जंतु नहीं दिखा।

ध्यान की अवस्था में जो वातावरण में दिखाई दे रहा था ऐसा लगता था कि सुबह हो रही है आसमान हल्का बुगा सा दिख रहा था ऐसा लग रहा था जैसे कि कोहरा कट रहा हो सामने बर्फ के पहाड़ दिखाई दे रहे थे। हम से थोड़ी ही दूरी पर यूकेलिप्टस जैसे लंबे वृक्षों की एक लंबी सी कतार दिखाई दे रही थी लेकिन जब मैंने उनकी ऊंचाई पर ध्यान दिया तो मैं आश्चर्य में पड़ गया क्योंकि वह वृक्ष इतने ऊंचे थे आकाश में उनका कहीं अंत ही दिखाई नहीं दे रहा था अर्थात वह वृक्ष अनंत आकाश की ओर ऊपर चले गये थे।

दूसरे तथा तीसरे लोक की भी लगभग यही स्थिति थी इन लोकों में पहले लोक की अपेक्षा अंधेरा और अधिक था अब पता नहीं कि यह अंधेरा बाहर के अंधेरे के कारण दिखाई दे रहा था? अथवा वास्तव में ही वहां असली अंधेरा था क्योंकि बाहर के मौसम में भी घनघोर अंधेरा था क्योंकि बादल बहुत घने छाए हुए थे।

वहां पर भी हमें बहुत ऊंचे खड़े हुए वृक्ष दिखाई दे रहे थे जिनका आकाश में कोई अंत नहीं था लेकिन वह वृक्ष बड़ी मुश्किल से देखने पर ही दिखाई दे पा रहे थे। इसके बाद हमें एक ईटों का बना हुआ मकान जोकि सीमेंट से जुड़ा हुआ था दिखाई दिया लेकिन यह मकान भी अनंत आकाश की ओर चला गया था जिसका कोई छोर दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन यह मकान तो हमारे जगत जैसा ही था। ऐसा कैसे हो सकता है कि जो लोक हमें दिखाया जा रहा है उस लोक में भी हमारे लोक जैसे ही मकान बने हों? ऐसा प्रश्न हमारे मन में उठा।

इसके बाद हमें अपने पास ही गोलाई में कटिंग किए हुए शो दार छोटे-छोटे वृक्ष तथा गोलाई में ही कटिंग किए हुए फूलों के वृक्ष भी दिखाई देने लगे लेकिन अंधेरे के कारण मैं उन्हें बड़ी ही मुश्किल से देख पा रहा था लेकिन इन वृक्षों की लंबाई अनंत आकाश की ओर नहीं गई थी।

जब मैंने सोहम मंत्र पर ध्यान दिया तो क्या हुआ?

इसी बीच मैंने सोहम मंत्र पर ध्यान देते हुए अपनी दृष्टि को अपने मस्तक की ओर आज्ञा चक्र स्थिर किया तो हमें अपने मस्तक पर नीचे से ऊपर के क्रम में चार लोक बिंदुओं के रूप में दिखाई दे रहे थे सबसे ऊपर सोहम का लोक एक बिंदु के रूप में मरकरी के प्रकाश जैसा दूधिया प्रकाश दे रहा था तथा अन्य लोकों के बिंदु उसी प्रकार दिखाई दे रहे थे जैसा वातावरण मैंने उन लोकों में देखा था।

मैंने अपने मस्तक में सबसे ऊपर सफेद चमक रहे सोहम के बिंदु पर ध्यान दिया तो सोहम के लोक का प्रकाश पूरे परदे पर फैल गया मैंने तुरंत ही अपना ध्यान वहां से हटा लिया मैंने सोचा कि अगर मैं अपनी फरमाइश करने लगूंगा तो कहीं हमारी कुंडलिनी द्वारा दिखाए जाने वाले दृश्य ही बंद न हो जाएं इसलिए मैंने अपनी फरमाइश बंद कर दी और कुंडलिनी द्वारा दिखाए जाने वाले दृश्य ही देखता रहा।

यह यात्रा हमारी पूरी रात चलती रही थी सुबह के समय वही सर्प के फल वाली लड़की के उन्हें कपड़ों में फिर से 5 फोटो सामने दिखाई दिए मेरे ध्यान में आया कि इस लड़की के फोटो मैंने कहीं न कहीं किसी पुस्तक या अन्य जगह देखे हैं तुरंत ही हमारे सामने एक लिस्ट आ गई उनमें कई देवियों की फोटो के साथ इस अर्ध नग्न लड़की का भी फोटो था। इस लड़की के 5 फोटो एक साथ दिखाने का क्या अर्थ था? हमारी समझ में तो एक ही जवाब आया कि यह लड़की अपने 5 फोटो दिखा कर हमसे यह कह रही है कि वह  पांचों तत्वों में मौजूद है। इसके कुछ देर बाद लड़की की फोटो वाला दृश्य गायब हो गया

हमारे चलते हुए 25 आसन

मैंने अपने लेटने के लिए बिछे हुए कंबल को ही आसन का रूप दे दिया था। कुंडलिनी की यात्रा में यहां तक आते-आते अपने आप लगातार 24 घंटे कुंडलिनी चलना बंद हो गई थी तथा जब भी मैं अपना ध्यान आज्ञा चक्र पर लगाता था वैसे ही कुंडलिनी के दृश्य शुरू होने लगे थे। काफी देर तक ध्यान लगाने के बाद में ध्यान को बंद कर आराम भी करने लगा था तथा आराम करके मैं फिर से लेट कर ध्यान शुरू कर देता और हमारे द्वारा आंखें बंद करते ही कुंडलिनी के दृश्य शुरू हो जाते

कभी-कभी ऐसा भी होता कि मैं अपनी बैरक से बाहर होता तो मैं आंखें बंद करके देख लेता कि कोई दृश्य तो नहीं चल रहे हैं और जैसे ही हमें आभास होता कि कोई दृश्य आ रहा है तो मैं तुरंत ही भागकर बैरक के अंदर अपने पहले से बिछे हुए कंबल पर लेट जाता और दृश्य देखने लगता।

अगली रात्रि जब मैं ध्यान में गया तो मैंने पूरी बैरक में 5 लाइनों में तथा प्रत्येक लाइन में अपने ही पांच बिछी हुई कंबल तथा उस कंबल के ऊपर में ही बैठा हुआ था इस प्रकार पूरी बैरक में मैं ही अपने ही उसी कंबल पर 25 जगह बैठा हुआ था।

मैंने उन बिछे हुए कंबलों को ध्यान से देखा उन प्रत्येक कंबल के पास हमारे तथा अन्य बंदियों के जूते भी रखे हुए थे इसके बाद मैंने आंखें खोल कर अपना बिछा हुआ कंबल तथा उसके पास रखे हुए जूते देखें हमारा यही कंबल 25 जगह पर दिखाया जा रहा था तथा प्रत्येक कंबल पर मैं ही बैठा हुआ था तथा प्रत्येक कंबल के आसन सहित मैं आगे को भी धीरे-धीरे चलता जा रहा था। तथा यह चलना हमारा उसी निर्धारित कुंडलिनी वाले रास्ते पर था।

दृश्यों से उठता प्रकाश

जिस प्रकार से छोटी-छोटी दुकानों के कमरे होते हैं उसी प्रकार के बने हुए कमरे हमारे सामने से गुजर रहे थे कुछ कमरों में बिल्कुल ही अंधकार फैला हुआ था कुछ भी दिखाई नहीं देता था लेकिन जैसे ही अंधकार वाला कमरा सामने आया उसमें से प्रकाश निकलने लगा उस प्रकाश से कुछ ज्योति जैसी निर्मित हुई और वह हमारे सिर की तरफ चली आई और हमारे सिर में प्रवेश कर गई।

इसी प्रकार से अन्य दिखाई देने वाले दृश्यों से भी प्रकाश की किरणें फूटने लगती थीं

बच्चों से भरा हुआ कमरा

हमारे सामने एक कमरा आ गया मैं भी उस कमरे के अंदर ही था वह कमरा 5 से  6 साल के बच्चों से भरा हुआ था सभी बच्चे खड़े हुए थे लेकिन वह बिल्कुल भी हरकत नहीं कर रहे थे। ऐसा लग रहा था कि वह बच्चे जीवित नहीं बल्कि या तो मृत हैं अथवा इन बच्चों की बिल्कुल असली दिखने वाली मूर्तियां खड़ी की गई हैं। मैं अनुमान लगा रहा था कि इन बच्चों से भी प्रकाश की किरणें निकलेंगी जैसा कि अन्य दृश्यों से प्रकाश की किरणें निकलती थी लेकिन उन बच्चों से प्रकाश की किरणें नहीं निकलीं।

कुंडलिनी का जंक्शन

कुंडलिनी एक रेलवे मालगाड़ी की तरह चार या पांच डिब्बों वाली गाड़ी दिखती है। अभी तक तो मैं इस प्रकार की एक ही गाड़ी को देखता आया था जिसमें मैं स्वयं ही यात्रा कर रहा था, लेकिन अबकी बार मैंने रेलवे स्टेशन की तरह खड़ी हुई कई कुंडलिनी वाली गाड़ियों को देखा इनमें से कई गाड़ियां चल रही थी कई वापस मुड़ रही थी। यह गाड़ियां जब मुड़ती हैं तो जिस प्रकार से 1 सांप तुरंत वापस मुड़ जाता है उसी प्रकार से यह सांप की तरह ही गाड़ियां भी मुड़ जाती हैं।

कुंडलिनी नामक रेलगाड़ी का मूलाधार से सहस्रार चक्र की तरफ ही जाना होता है इस जंक्शन से मैंने देखा कई गाड़ियां मूलाधार से सहस्रार चक्र की तरफ जा रही हैं। कुछ गाड़ियां वापस मुड़ रही है, तथा कुछ वापस मुड़कर जा रही हैं लेकिन इन गाड़ियों के खड़े होने का क्रम एक विशिष्ट क्रम था जिसे बगैर चित्र बनाए अच्छी तरह नहीं समझा जा सकता

अनेकों कुंडलिनी गाड़ियों का दिखाए जाने के पीछे मकसद क्या था? यह एक रहस्य है।

देवताओं के वाहन

1-देवी अथवा भैरव का वाहन काला कुत्ता

2- शनि का वाहन कौआ

3- गंगा का वाहन मगरमच्छ

4- बगैर शरीर का प्राणी

रात्रि को हम ध्यान की अवस्था में दृश्य देख रहे थे तभी हमारे सामने बाई तरफ से अर्थात सहस्त्रार चक्र की तरफ से आती हुई दृश्यों में एक छोटा सा काला कुत्ता सामने आ गया। वह छोटा सा कुत्ता हमारी तरफ ही बार-बार घूर घूर कर देख रहा था।

इसके बाद हमें एक कौवा या कौवा जैसा पक्षी भी फुदकता हुआ दिखाई दिया इसी बीच में एक मगरमच्छ भी चलता हुआ दिखा।

बगैर शरीर का प्राणी

इसके बाद हमें एक ऐसे प्राणी का आभास हुआ जो अपने हाथ में एक डंडा या लाठी लिए हुए था हमें उसकी लाठी डंडा भी पूरी तरह दिखाई नहीं दे रहा था बल्कि उस लाठी की ऊपर की मूंठ ही केवल दिखाई दे रही थी वह मौत हमारे पास चलती हुई आई ऐसा लगा कि जैसे कोई प्राणी हमारी तरफ आ रहा है तथा वह हमारे पास बैठ गया। इसी प्रकार से वह प्राणी हमारे पास आकर चार-पांच दिनों तक हमारे बाएं तरफ बैठा वह प्राणी कौन था यह मैं अब तक नहीं जान पाया हूं लेकिन फिर भी हमारा अनुमान है कि वह शायद भैरव ही थे क्योंकि भैरव के हाथ में ही लाठी या डंडा भी होता है।

विशुद्ध चक्र समाप्त होते समय जो अंतिम में देवी देवताओं की लिस्ट सामने आई वह काफी लंबी थी इतनी लंबी लिस्ट के बारे में किसी भी प्राचीन पुस्तक में नहीं लिखा हुआ है। प्रत्येक चक्र में प्राचीन काल की पुस्तकों में जिन देवी-देवताओं के बारे में वर्णन किया गया है हमारे द्वारा देखे गए देवी देवता उनसे भिन्न हैं।

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