तीसरा नेत्र खुलने में कुंडलिनी जागृत होने की सत्य घटना


तीसरा नेत्र खुलने व कुंडलिनी जागृत होने की सत्य घटना
घटना 4 वर्ष पूर्व की है उधारी का तकाजा करते समय फर्रुखाबाद कंपिल पुलिस ने हमारे ऊपर फर्जी मुकदमा लगाकर फतेहगढ़ की जला जेल में भेज दिया।
जेल में मैंने ध्यान लगाना शुरू कर दिया घर पर मैं दारु पीने की बुरी आदत के कारण ध्यान नहीं लगा पाता था। जेल में ध्यान के दौरान मुझे  कुछ अद्भुत सा अनुभव होने लगा। मेरे मस्तक से सफेद उल्कापिंड जैसे निकलकर घूमने लगे तथा मस्तक से बादल निकलकर दायी तरफ को जाने लगे। उसी दौरान सपने में हमें एक देवी दिखी, मैंने देवी से कहा कि तुम हमारे शरीर में प्रवेश कर जाओ, यह सुनकर देवी हमें एक कुटिया जैसे आश्रम में ले गई, वहां बहुत साधु संतों के अलावा उनके साथ एक लड़की भी थी। देवी ने हमें उस लड़की के सामने खड़ा कर दिया और कहा कि यह लड़की अब तुम्हारे ही साथ रहेगी। उस लड़की ने हमें एक भगवा रंग का चादरा दिया जिसे मैंने अपने ऊपर ओढ़ लिया। उस लड़की ने एक दूसरा चादरा और दिया जिसे मैंने अपनी कमर में तहमद की तरह लपेट लिया। हमारा भेष बिल्कुल बाबाओं जैसा हो गया। वह लड़की स्वयं लाल साड़ी पहनी हुई थी तथा हल्का सा मुंह पर घूंघट डाले हुए थी। मैं उसका चेहरा नहीं देख सका सपना समाप्त हो गया।
धीरे-धीरे प्रतिदिन ध्यान में अनुभव बढ़ने लगे। मस्तक से बादल निकल कर  गहराने लगे तथा प्रकाश की विचित्र डिजाइनिंग देखने को मिलने लगे। मुझे ध्यान में बहुत ही आनंद आने लगा। मैं अब पूरा पूरा दिन बैरक में चादर ओढ़ कर लेटे ही ध्यान करने लगा। मै निकलते हुए उल्का पिंडों को बड़े ही ध्यान से देखता, कभी वह घूमते हुए बाहर की ओर निकलते दिखाई देते, कभी लगता कि हमारे मस्तक से उल्कापिंड निकलकर किसी गहरी सुरंग में जा रहे हैं। इसके बाद धीरे-धीरे पूरे परदे पर सफेद रंग का प्रकाश फैल जाता तथा दृश्य गायब हो जाते। रात और दिन दोनों समय सफेद और काले बादलों का निकलना जारी था। जो बादल रात को काले दिखते थे वही बादल दिन में कत्थई रंग के अद्भुत नजारा पेश करते थे। धीरे-धीरे दृश्यों में बदलाव हुआ, पर्दे पर एक चमकीले रंग का बिंदु उभरा उस बिंदु से एक प्रकाश की किरण निकलकर कभी हमारे सर के ऊपर से निकल जाती तथा कभी हमारे दाएं तथा कभी बाएं से निकल जाती। मैंने कोशिश की कि उसका फोकस हमारे चेहरे पर पड़े हमारी कोशिश से उसका प्रकाश हमारे चेहरे पर पड़ने लगा लेकिन जब मैं  उस निकलते हुए प्रकाश को ध्यान से देखता तो वह कभी हमारे मस्तिष्क से निकलता हुआ दिखता कभी लगता के उस बिंदु से प्रकाश हमारे चेहरे पर पड़ रहा है। यहां पर हमारी भ्रम की स्थिति थी।
तीसरा नेत्र खुलने व कुंडलिनी जागृत होने की सत्य घटना
घटना 2 वर्ष पूर्व की है उधारी का तकाजा करते समय फर्रुखाबाद कंपिल पुलिस ने हमारे ऊपर फर्जी मुकदमा लगाकर कंपिल की जेल में भेज दिया।
जेल में मैंने ध्यान लगाना शुरू कर दिया घर पर मैं दारु पीने की बुरी आदत के कारण ध्यान नहीं लगा पाता था ध्यान में मुझे कुछ अद्भुत सा अनुभव होने लगा मेरे मस्तक से सफेद उल्कापिंड जैसे निकलकर घूमने लगे तथा मस्तक से बादल निकलकर दायी तरफ को जाने लगे उसी दौरान सपने में हमें एक देवी दिखी, मैंने देवी से कहा कि तुम हमारे शरीर में प्रवेश कर जाओ देवी हमें एक कुटिया जैसे आश्रम में ले गई वहां बहुत साधु संतों के अलावा एक लड़की भी थी देवी ने हमें उस लड़की के सामने खड़ा कर दिया और कहा कि यह लड़की अब तुम्हारे ही साथ रहेगी उस लड़की ने हमें एक भगवा रंग का चादरा दिया जिसे मैंने अपने ऊपर ओढ़ लिया उस लड़की ने एक दूसरा चादरा और दिया जिसे मैंने अपनी कमर में तहमद की तरह लपेट लिया हमारा भेष बिल्कुल बाबाओं जैसा हो गया वह लड़की स्वयं लाल साड़ी पहनी हुई थी तथा हल्का सा मुंह पर घूंघट डाले हुए थे मैं उसका चेहरा नहीं देख सका सपना समाप्त हो गया.
धीरे-धीरे प्रतिदिन ध्यान में अनुभव बढ़ने लगे मस्तक से बादल निकल कर  गहराने लगे तथा प्रकाश की विचित्र डिजाइनिंग देखने को मिलने लगी मुझे ध्यान में बहुत ही आनंद आने लगा मैं अब पूरा पूरा दिन बैरक में चादर ओढ़ कर लेटे ही ध्यान करने लगा मै निकलते हुए उल्का पिंडों को बड़े ही ध्यान से देखता कभी वह घूमते हुए बाहर की ओर निकलते दिखाई देते कभी लगता कि हमारे मस्तक से उल्कापिंड निकलकर किसी गहरी सुरंग में जा रहे हैं इसके बाद धीरे-धीरे पूरे परदे पर सफेद रंग का प्रकाश फैल जाता तथा दृश्य गायब हो जाते हैं रात और दिन दोनों समय सफेद और काली बादलों का निकलना जारी था जो बादल रात को काले दिखते थे वही बादल दिन में कत्थई रंग के अद्भुत नजारा पेश करते थे धीरे-धीरे दृश्य बदले पर्दे पर एक चमकीले रंग का बिंदु उभरा उस बिंदु से एक प्रकाश की किरण निकलकर कभी हमारे सर के ऊपर से निकल जाती तथा कभी हमारे दाएं तथा तथा कभी बाएं से निकल जाती मैंने कोशिश की कि उसका फोकस हमारे चेहरे पर पड़े हमारी कोशिश से उसका प्रकाश हमारे चेहरे पर पड़ने लगा लेकिन जब मैं  उस निकलते हुए प्रकाश को ध्यान से देखता तो वह कभी हमारे मस्तिष्क से निकलता हुआ दिखता कभी लगता के उस बिंदु से प्रकाश हमारे चेहरे पर पड़ रहा हैयहां पर हमारी भ्रम की स्थिति थी

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