Kundlini Shakti
Apni kundli Shakti ko jagane ke liye hamare Nana ji Shri Jagdish Singh Chauhan Hari singhpur wale se sampark Karen
तीसरे नेत्र का खुलना
ध्यान में सुबह दोपहर शाम दिन ढलने के अनुसार ध्यान के दृश्य में भी बदलाव होता जाता था शाम के समय बहुत ही अद्भुत दृश्य दिखाई देने लगे एक शाम दाई ओर से बाई तरफ से देवी देवताओं के पूरे शरीर में दिखने वाले आभामंडल जैसे गोलों के निकलने का सिलसिला शुरू हो गया धीरे धीरे उन गोलों मे देवियों की अस्पष्ट सी आकृतियां उभरने शुरू हो गई उसके अगले दिन शाम को फिर गोले निकले, दो गोले तो ऐसे ही निकल गए तीसरे गोले में नीचे की तरफ अचानक एक चौकोर खिड़की खुल गई उसके अंदर मैंने देखा के आदमियों की भीड़ ही भीड़ भरी हुई थी जैसे अचानक खिड़की खुली वैसे ही तुरंत बंद भी हो गई इसके दूसरे दिन गोलों में बहुत सुंदर सी आकृतियां बनी हुई निकली। यह आकृतियां किसकी थी हमारी समझ में नहीं आया।
अगला दृश्य
दोपहर के ध्यान में हमें एक सड़क दिखाई दी सड़क पीछे की ओर भाग रही थी मैंने विचार किया कि कहीं मैं किसी गाड़ी पर तो नहीं बैठा हुआ हूं मेरा इतना विचार करना था कि मुझे गाड़ी का बोनट सामने दिखाई देने लगा अर्थात मैं गाड़ी पर बैठा हुआ था। गाड़ी सड़क पर तेजी से भाग रही थी तथा सड़क पीछे की ओर भागती हुई दिखाई दे रही थी लेकिन मैं जानता था कि मैं जेल में लेटा हुआ ध्यान कर रहा हूं।
इसी दिन शाम को जैसे ही लेट कर मैंने अपनी चादर उड़ी तथा आंखें बंद की तो हमारा सिर कई जगह से लप-लप करता हुआ दिखने लगा मैंने ध्यान दिया आज्ञा चक्र आंखों के दोनों साइड के किनारेसिर के ऊपर सहस्त्रार की जगह जहां पर शिव का चंद्रमा दिखाया गया है वहां पर इसके बाद मैंने नीचे की तरफ देखा तो हमारे कंठ में छाती में नाभि स्वाधिष्ठान तथा मूलाधार चक्र सारे लप-लप कर रहे थे यह सभी स्थान काफी देर तक लपकते रहे मैं पूरे दिन ही ध्यान करने लगा क्योंकि मुझे ध्यान में बड़ा ही आनंद आ रहा था ऐसे दृश्य बहुत ही दुर्लभ थे ध्यान में मैंने कोई मंत्र वगैरह नहीं जा पाता नहीं किसी देवता का ध्यान किया था मैं तो केवल देख रहा था।मैं सोच रहा था कि देखो आगे क्या क्या होता है?
तीसरा नेत्र खुलने की घटना का चौथा भाग
अगले दिन सुबह ध्यान में मैं एक पानी के जहाज पर सवार हो गया जहाज आगे बढ़ रहा था तथा उसके किनारे के बने हुए मकान तथा वृक्ष निकलते चले जा रहे थे यह दृश्य यहीं पर खत्म हो गया दूसरी बार जब मैं ध्यान पर लेटा तो मैं हवाई जहाज पर सवार था नीचे के दृश्य बहुत तेजी से निकलते चले जा रहे थे.
ध्यान में मैं एक सड़क किनारे खड़ा हुआ था दो बसें हमारे सामने ही तेजी से गुजर गई इसके बाद मैंने अपने आप को एक किसी गाड़ी पर बैठे हुए पाया जो कि एक ऊंचे पुल से गुजर रही थी पुल के नीचे हरी-भरी खेती दिखाई दे रही थी.
राक्षस और शिशु बच्चा
उस दिन जेल में हमारे मित्रों ने अंडे बनाए थी मैंने भी अंडे खाए खाना खाने के बाद मैं ध्यान में चला गया ध्यान में मेरे सामने से एक मेटाडोर गाड़ी जिसमें कि लोहे का सरिया जैसा कुछ लदा हुआ था तेजी से गुजर गई इसके बाद एक जवान राक्षस का लड़का जिस के छोटे-छोटे सींग निकले हुए थे , हमारी तरफ आया और हमारे शरीर में तीन बार प्रवेश कर गया मुझे तुरंत ही विचार आया कि मैंने आज अंडे खाए हैं इसलिए हमारे शरीर में यह राक्षस प्रवेश कर गया है हमारा इतना सोचना था कि पलक झपकते मैंने अपने आप को एक गंदे नाले के पुल के पास खड़ा हुआ पाया तुरंत ही यह दृश्य गायब हो गया इसके बाद हमारे बाएं तरफ से एक शिशु बच्चा आ गया वह कुछ देर तक बना रहा मुझे विचार आया कि हमारे घर पर हमारा पोता शिव पैदा हुआ है यह बच्चा हमारा पोता शिव ही हो सकता है इसके बाद उक्त दृश्य गायब हो गया।
दृश्य खत्म होने के बाद हमारे सामने एक सुरंग जैसी प्रकट हो गई उसमें से सोने की चूड़ियां जैसी निकलने लगी तथा निकलकर हमारे आज्ञा चक्र में प्रवेश करने लगी मैंने और ध्यान से देखा तथा सोचा कि कहीं हमारी आज्ञा चक्र से निकलकर तो नहीं जा रही हैं इतना सोचते ही वह सोने की चूड़ियां हमारे आज्ञा चक्र से निकलकर उस सुरंग में प्रवेश करने लगी हमारी समझ में नहीं आ रहा था कि यह दोनों बातें एक साथ कैसे हो सकती हैं लेकिन जो हो रहा था सामने दिखाई दे रहा था.
आकाश से उतरते देवता
दूसरे दिन दिनभर मैंने ध्यान में क्या देखा मुझे याद नहीं पड़ता रात्रि को जैसे ही मैंने ध्यान के लिए आंखें बंद की सामने का पर्दा सफेद प्रकाश से भर गया इसके बाद पूरा पर्दा कभी दाएं तो कभी बाऐ घूमने लगा।
तीसरी नेत्र का खुलना भाग ५
जब घूमना शांत हुआ तो ऐसा लगा किस सामने कोहरा गिर रहा है गिरते कोहरे में हमें चार पाच साऐ आसमान से उतरते हुए दिखाई दिए मैंने सोचा कि यह निश्चित ही देवता ही होंगे उनके शरीर व चेहरे हमें स्पष्ट दिखाई नहीं दिए .
आसमान से नक्शों का बरसना
अज्ञात सायों का कूदना बंद हुआ उसके बाद आकाश से नक्शे बरसने लगे यह नक्शे किन देशों के थे अथवा ग्रहों के थे कुछ भी नहीं पता उन नक्शा में मैंने भारत का नक्शा पहचान लिया इसके बाद भारत का नक्शा देखते ही मेरे ललाट पर बार-बार भारत का नक्शा उभरने लगा तथा उभरकर वह प्रकाश मय गोले मे परिवर्तित हो जाता की थोड़ी देर बाद नक्शों का बरसना बंद हो गया.
फोटोग्राफों की बरसात
इसके बाद विभिन्न व्यक्तियों के फोटोग्राफों की बरसात शुरू हो गई लाखों की संख्या में आसमान से फोटोग्राफों की बरसात हुई यह फोटो किन व्यक्तियों के थे कुछ भी नहीं पता तथा फोटोग्राफ की बरसात क्यों हुई यह भी अज्ञात है इन फोटोग्राफ़ो मे एक व्यक्ति का फोटोग्राफ मैंने हाथ में लेकर देखा यह किसी जवान व्यक्ति का फोटोग्राफ था इस व्यक्ति की चर्चा बाद में करूंगा यह सारे दृश्य मैंने दिन में देखे थे.
तीसरे नेत्र का खुलना
इसी दिन शाम के समय जब मैंने ध्यान लगाया तो पूरा सामने का दृश्य पटल घूमने लगा घूमते हुए दृष्टि पटल के बीच में एक त्रिशूल प्रकट हो गया उस त्रिशूल के तीनों फलकों से आग की लौ निकल रही थी थोड़ी देर बाद त्रिशूल गायब हो गया. इसके बाद एक चक्र हमारे भौहों के मध्य तेजी से घूमने लगा घूमते घूमते अचानक वह वहां से गायब हो गया चक्र वाले स्थान पर एक गोल छेद हो गया उस छेद से नीला आकाश साफ दिख रहा था ऐसा लग रहा था कि मैं किसी दूरबीन से आकाश को देख रहा हूं धीरे धीरे वह आकाश पास आता गया तथा गोल छेद का दायरा बढ़ने लगा इसके बाद पर्दे पर पूरा आकाश छा गया आकाश में दो विमान चक्कर काट रहे थे उनमें से एक विमान हमारे सामने ही हवा में ऊपर उठ रहा था इसके बाद दोनों विमान हमारे तीसरे नेत्र से ओझल हो गए मेरी समझ मे आ चुका था कि हमारा तीसरा नेत्र खुल गया है मुझे ध्यान करते हुए काफी देर हो चुकी थी इसलिए मैं थक गया था तथा खाना खाने का समय भी हो चुका था इसलिए मैंने ध्यान बंद कर दिया.
.
कुंडलिनी जागृत होने पर दिखने वाले दृश्यों की लिस्ट
अगर आपकी कुंडलिनी जागृत है तो कृपया नीचे दी गई कुंडलिनी के देखे गए दृश्यों को देखकर जानकारी दें कि इन दृश्यों के पीछे क्या कहानी घटित हुई?
अगर आप जवाब नहीं दे पाते हैं तब आपकी कुंडलिनी नहीं खुली हुई है कुंडलिनी की मामले में आप भ्रमित हैं।
१ मूलाधार में घूमता हुआ अद्भुत शिवलिंग
२ मूलाधार से निकलती काले गंदे कीचड़ की धारा ।
३ एक रेलगाड़ी (रेलगाड़ी नहीं है लेकिन चलने पर रेलगाड़ी जैसी दिखती है) से यात्रा में दिखते पर्वत पहाड़ ।
४ जब दृश्य देखकर घबराहट बा मृत्यु की आशंका होने लगी ।
५ यात्रा में निकलते प्राचीन काल के मकान बच्चे काम करती महिलाएं।
६ अधिकतम लाल रंग तथा अन्य रंग के अद्भुत द्रश्य।
७. बरामदे में एक नृत्य करती हुई लड़की।
८. गोलाकार वह बेलनाकार निकलते पिन्ड।
९. मूर्तियों से भरी आती हुई रेलगाड़ी।
१०. सामने आती दीवाल का रहस्य।
११. कुंडलिनी के साथ साधक का अपने केंद्र
१२. मकानों का रेलगाड़ी की तरह दौड़ना।
१३. भीड़ भरे दृश्य।
१४. हाथ में गदा लिए जाता एक बहुत लंबा देवता।
१५. चक्र पूरा होने पर ऊपर से नीचे की ओर एक कागज की रील में
चक्र की फोटो के साथ उस चक्र से संबंधित देवी देवताओं की फोटो लिस्ट आना।
१६. ध्यान के लिए चादरा ओढ़ते ही उसका बदलते हुए दिखाई देना।
१७. हमारे ऊपर चावलों का फेंका जाना।
१८. घूमता हुआ ग्राउंड।
१९. आतिशबाजी जैसा दृश्य।
२०. अंतरिक्ष में ब्लैक मैटर के बीच यात्रा।
२१. तारों भरा आकाश।
२२. सर्पाकार गति से चलते तारे।
२३. आकाश से बरसे फोटो में एक लाल शर्ट वाला व्यक्ति।
२४. शिर के बाहरी भाग में लाल रोशनी।
२५. दीपक की रोशनी से हिलती छाया।
२६. विभिन्न जीवो की शोभायात्रा।
२७. जल में लहराता हुआ लाल रंग का सर्प।
२८. एक लाइन में एक ही शक्ल के 5 या 7 पानी में तैरते व्यक्ति।
२९. चित्र अवस्था में लेटे एक ही शक्ल के 5:00 या 7:00 सरकते हुए व्यक्ति।
३०. रेगते हुए काले सर्प
कुंडलिनी चक्रों में देखे गए दृश्यों की दूसरी लिस्ट
३१. पीले पदार्थ से भरी छोटी बड़ी तीन क्रेड
३२. खिलता हुआ कमल।
३३. बिल्डिंग का नक्शा बदलना।
३५. जेल पेशी पर हमारी गाड़ी के साथ चल रही एक अन्य गाड़ी।
३६. हमारी गाड़ी का भीतरी नक्शा बदलना।
३७. प्रकाश से निर्मित होती वस्तुएं।
३८. बच्चों से भरा हुआ कमरा।
३९. तेज होता अनाहत न और लट्ठे का दृश्य।
४०. काले सर्पों से भरा कमरा
४१. सांसो पर ध्यान
४२. सट्टे का नंबर मांगने पर अंक शास्त्र का हैरतअंगेज चार्ट जिसमें नंबर घूम रहे थे।
४३. आंखें बंद कर भी बाहर का सव कुछ देखने की दृष्टि मिली।
४४. कहीं अनजाने व्यक्तियों के एक एक कर फोटोग्राफ़ो का निकलना।
४५. काले सर्प के फन पर खड़ी एक अर्ध नग्न लड़की।
४६. आकाशीय बंगला।
४७. तीन लोकों की यात्रा।
४८. अनंत आकाश की ओर जाते इस वृक्ष व मकान।
४९. अट्टालिका की खिड़की से निकलता प्रकाश।
५०. चलते हुए बिस्तर।
५१. कुंडलिनी का जंक्शन।
५२. देवताओं के बाहनो का आना
काला कुत्ता
कौवा या कौवा जैसा पक्षी
५३. हमारे पास बैठने वाला बगैर शरीर का अद्भुत व्यक्ति।
५५. एक ही शक्ल के हाथ में कुल्हाड़ी लिए हुए लगभग पांच काली दाढ़ी वाले बाबा।
५६. ब्लैक एनर्जी से होता ब्रम्हांड का निर्माण ब्रह्मांड निर्माण की बिग बैंग थ्योरी गलत है।
५७. सारे ग्रहों का होता निर्माण
५८. मुकुट का होता निर्माण।
५९. अद्भुत जुगनू।
६०. अद्भुत खुशबू।
६१. तीन दिन पूर्णिमा की रात।
६२. ध्यान में होता सूर्य ग्रहण।
६३. चक्कर लगाते ग्रहों के बाहन।
६४. टप टप करके टपकता अमृत।
६५. सहस्त्रार की ओर जाने का अद्भुत अनुभव और घबराहट।
६६. सिर के ऊपर बनता पत्तीदार सहस्त्रार ।
६७. सट्टा नंबर प्राप्त करने का अद्भुत अंक शास्त्र का चार्ट।
६८. हमारे सिर में भैंसा जैसे बड़े-बड़े सीग निकले।
६९. स्वास पर ध्यान दिया तो एक लंबा लट्ठा प्रगट हुआ जिसके ऊपर मैं बैठा हुआ था तथा लट्ठे के नीचे भी मैं ही खड़ा हुआ था नीचे मैं छोटा सा दिखाई दे रहा था।
७०. पूर्व कहानी में आसमान से उत्तरे पांच देवता जिनके शरीर कठपुतलों जैसे थे।
७१. कठपुतले देवताओं की आसमान में सभा।
क्या आपकी कुंडलिनी जागृत है? अगर आप हमारे इन प्रश्नों का जवाब नहीं दे पाते हैं तो आपकी कुंडलिनी जागृत नहीं है।
प्रश्न नंबर 1—
कुंडली चलने का एक मुख्य पर निर्धारित रास्ता है यह रास्ता मोड़दार है मूलाधार से लेकर आज्ञा चक्र तक सारे दृश्य इसी रास्ते से होकर चलते हैं उस रास्ते का रेखा चित्र बनाएं।
नंबर दो--
मूलाधार से जब कीचड़ की धारा निकली तो रास्ते में मिलने वाले तीन कच्चे मकान कहां पर बने थे। नंबर 3
जब कोई दृश्य निकलते हैं अर्थात कुंडलिनी चलती है तो कुंडलिनी चलने के साथ-साथ देखने वाला साधक भी अपनी दूरी पर घूमता है साधक के घूमने के कोंण के बारे में बताएं।
नंबर ४ साधक के सामने का ग्राउंड कैसे घूमता है?
नंबर 5
कुंडलिनी में जो चलती हुई रेलगाड़ी जैसी दिखती है बताएं वह क्या दौड़ता है?
नंबर 6
कुंडलिनी मूलाधार बा सहस्त्रार की ओर जाकर वापस आने के लिए कैसे मुड़ती है, मुड़ने का रेखा चित्र बनाएं।
नंबर 7
ब्लैक मैटर से गुजरने की यात्रा का अनुभव बताएं।
नंबर 8
पीली पदार्थ से तीन क्रेडो का आगे क्या हुआ?
नंबर 9
काले सर्पों से भरे हुए कमरे में सर्पों की सैटिंग किस प्रकार के क्रम में है?
नंबर 10
सर्प के फन पर खड़ी हुई लगभग 18 वर्ष की लड़की के कपड़े कैसे हैं?
नंबर 11
आकाशीय बंगला बनने की घटना कैसे हुई?
नंबर 12
ब्लैक इनर्जी से तारों व ब्रम्हांड का निर्माण कैसे होता है?
नंबर १३
अद्भुत जुगनू का क्या कार्य है?
नंबर 14
तीसरे नेत्र का अपने प्राचीन ग्रंथों में क्या रोल है?
नंबर १५
विभिन्न जीवो की शोभायात्रा में कौन-कौन से जीव सम्मिलित थे?
नंबर 16
सिर पर हजार पंखुड़ी वाला पत्तरीदार शून्य चक्र/सहस्त्रार चक्र वनने की घटना कैसे घटित हुई?
आगे की कहानी कुंडलिनी दिनांक २३-३-२०२२
कुंडलिनी जागृत होने का दुनिया का पहला अनुभव
पिछली कहानी में हमारे मस्तक पर एक चक्र तेजी से घूमने लगा घूमते घूमते अचानक वह वहां से गायब हो गया चक्र की जगह एक छिद्र(होल) बन गया उस छिद्र से देखने पर ऐसा दिखता था कि मैं किसी दूरबीन से देख रहा हूं हमें नीला आकाश स्पष्ट दिखाई दे रहा था धीरे-धीरे उस छिद्र से गोल दिखने वाला आकाश पास आता गया और उस आकाश का दायरा भी बढ़ता गया इसके बाद पूरे पर्दे पर आकाश फैल गया आकाश में दो विमान उड़ रहे थे एक विमान बिल्कुल हमारे पास से ही हवा में ऊपर उठ रहा था। यहीं पर मैंने ध्यान वन्दे कर दिया था।
उसी रात खाना खाने के बाद जब मैं ध्यान के लिए लेटा और अपनी आंखें बंद की प्रतिदिन की तरह हमारे सिर के कई हिस्से , भौंहों के किनारे तथा सहस्त्रार चक्र से लेकर मूलाधार तक सारे चक्र तेजी से कंपन करते दिखाई दे रहे थे इसके बाद सामने के पर्दे पर प्रकाश फैल गया सामने का पूरा ग्राउंड दाएं बाएं घूमने लगा मैंने देखा कि अचानक एक गीली मिट्टी का पतला सा डेढ़ फुट लंबा तथा लगभग दो इंच चौड़ा एक शिवलिंग अपनी धुरी पर तेजी से घूम रहा था वह ऐसे घूम रहा था जैसे किसी कुम्हार के चाक पर घूम रहा हो
गीली मिट्टी का होने के कारण उसका पानी स्पष्ट रूप से छलक रहा था उसके नीचे लाल फूल पड़े हुए थे घूमते घूमते वह शिवलिंग गायब हो गया अब वहां पर एक पत्थर का शिवलिंग प्रगट हो गया उसका एक चबूतरा भी बना हुआ था वह भी शिवलिंग चबूतरा सहित घूम रहा था।
गंदा कीचड़ और उसकी धारा
और भी हमें कुछ दृश्य दिखाई दिये लेकिन मैं ध्यान नहीं कर पाया अचानक मुझे महसूस हुआ कि हमारे नाभि के नीचे के हिस्से पर किसी ने गंदा कीचड़ डाल दिया हो वह गंदा व काला कीचड़ हमारे पेट के ऊपर सीने के बीच से होते हुए मुंह नाक तथा मस्तक के ऊपर बीच से बहते हुए हमारे शिर के ऊपर से इस तरह नीचे गिरने लगा जैसे शिवजी के शिर से गंगा निकलकर नीचे गिर रहीं हैं।
मुझे दिखाई दिया कि उक्त गिरने वाली कीचड़ की धारा ऊपर से नीचे की तरफ वृक्षों के झुंड के बीच से होकर बहती जा रही है, मैंने जब धारा की तरफ ध्यान से देखा तो मैं हैरान रह गया क्योंकि उस धारा के साथ नीचे की जमीन भी धीरे-धीरे धारा के साथ आगे को सरकती जा रही थी ।
धारा और तीन कच्चे मकान
जब धारा नीचे की तरफ पहुंची तो वहां एक मोड़ पर तीन कच्चे मकान बने हुए थे मैंने देखा की उस धारा के साथ तेजी से एक मकान आगे जाकर ढह गया इसी तरह एक एक कर तीनों मकान जमीन में मिल गए इसके बाद उक्त धारा किधर को चली गई मैं देख नहीं पाया।
रेलगाड़ी पर यात्रा देखने वाले पर्वत और पहाड़
इसके बाद मुझे दिखाई दिया कि मैं एक खुली हुई छत वाली रेलगाड़ी पर सवार हूं और रेलगाड़ी तेजी से आगे को चली जा रही है छोटे-छोटे पर्वत पहाड़ सामने से निकलते चले जा रहे हैं एक पहाड़ मैंने बहुत ऊंचा देखा इतना ऊंचा गगनचुंबी पहाड़ देखकर मुझे भय सा लगने लगा। मैंने अपने हाथ पैरों को टटोला कि कहीं में सपना तो नहीं देखने लगा हूं लेकिन मैं सपना नहीं देख रहा था मैं जागृत अवस्था में था।
अचानक मुझे महसूस हुआ कि मेरे शरीर का एक हिस्सा आकाश की ओर ऊपर उठता जा रहा है तथा मैंने दूसरी ओर देखा तू मेरा दूसरा हिस्सा भी ऊपर की ओर जा रहा था मुझे आशंका होने लगी कि कहीं हमारी मृत्यु तो नहीं हो रही है मेरे दिमाग में बुरी तरह घबराहट फैल गई मेरा सारा शरीर कांपने लगा मैंने सोचा कि अगर मैं इसी तरह इस गाड़ी पर यात्रा करता रहा और हमें जरा सी भी झपकी आ गई गाड़ी से मैं किस जगह उतर जाऊं फिर मैं वापस भी नहीं आ सकता तब मेरी मृत्यु निश्चित है किसी घबराहट में मैंने ध्यान बंद कर दिया और अपनी ओढ़ी हुई चादर को अलग हटा दिया।
मैं दिन में भी पूरे दिन ध्यान करता रहा था तथा अब काफी रात भी हो गई थी मुझे बहुत तेज नींद भी लगी हुई थी लेकिन एक बार जब कुंडलिनी चलना शुरू हुई तो अब वह बंद नहीं हो रही थी, मैं उठ कर बैठ गया उस दिन हमारे पास पीने के लिए बीड़ी बंडल भी नहीं था मैं तुरंत ही एक बीड़ी बेचने वाले व्यक्ति को जगा कर उससे एक बंडल खरीद लाया मैंने लगातार तीन चार बीड़ी फूंक डाली मैंने आंख बंद कर पुन: देखा तो हमें दिखाई दिया कि हमारी कुंडलिनी में दृश्य चल रहे हैं,
हमारे पूरे शरीर में सन्नाटा सा छाया हुआ था हमें ऐसा महसूस हो रहा था जैसे हमने अत्यधिक भांग का नशा किया हुआ हो हमारी जान पर अटकी हुई थी घबराहट हमें दृश्य देखकर नहीं हो रही थी बल्कि हमें नींद के कारण भय हो रहा था कि कहीं मैं सो गया तो मृत्यु हमारी निश्चित है, स्वप्न में अगर मैं गाड़ी से उतर गया और बैठने का ख्याल ना रहा तब तो मरना निश्चित ही है मुझे कोई उपाय नहीं सूझ रहा था।
कुंडलिनी शुरू हो गई तो वह बंद नहीं हो रही थी हमारे पास नींद लेने तक का मौका नहीं था
मैं महामृत्युंजय का जाप करने लगा धीरे-धीरे हमारी हिम्मत बढ़ी और मैं फिर से ध्यान करने के लिए लेट गया और रात भर दृश्य देखता रहा।
सहस्त्रार चक्र की ओर से एक रेलगाड़ी मूलाधार की ओर चली आई और उसके सामने लगे दो मोटे मोटे पाइपों से तेजी से पानी निकलने लगा मुझे समझ में आया कि यह अब मूलाधार की धुलाई हो रही है।
रात जैसे तैसे गुजरी दूसरा दिन शुरू हुआ लेकिन कुंडलिनी जो एक बार शुरू हो गई थी अब विराम करने तक का समय नहीं दे रही थी हमारी नींद के कारण हालत खराब हो रही थी अपनी समस्या बताए तो किसे बताएं इसका कोई जानकार गुरु भी नहीं था जिससे अपनी बात कहें इस संबंध में पहले से कोई इस तरह की घटना मैंने किसी पुस्तक में भी नहीं पढ़ी थी ।
मुझे कुंडलिनी के वारे में पूरी तरह जानकारी भी नहीं थी तथा इस तरह की घटना घटित हो जायेगी ,मैंने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी। मै वार वार प्रार्थना
कर रहा था कि दो तीन घंटे के लिये कुंडलिनी रुक जाते तो मैं नींद लें लूं इसके वाद फिर कुंडलिनी खूब चलती रहे लेकिन कुंडलिनी नहीं रुकीं उसका चौबीस घंटे चलना जारी रहा।
पूरे दिन मैं लेटा हुआ दृश्य देखता रहा रात्रि को मैंने बहुत ही सुंदर व अद्भुत रंग-बिरंगे सर्पों के दृश्य देखे मुझे पिछली रात्रि के भय से बड़ी ही राहत महसूस हुई।
लेकिन पता नहीं क्या हुआ कि उस रात के सारे दृश्य हमारे दिमाग से डिलीट हो गए कुछ भी याद नहीं पड़ रहा है।
इस समय मैं किस चक्र में चल रहा था मुझे कुछ भी पता नहीं है।
प्रथम चक्र मूलाधार चक्र की यात्रा
अब मैं थोड़ी बहुत देर को ही अपनी बैरक से बाहर निकलता था अन्यथा लेट कर दृश्य देखता रहता था अब तो दृश्य देखने के लिए चलते फिरते भी हमें आंखें बंद करने पर दृश्य दिखाई देने लगते थे खुली आंखों के इस पार भौतिक जगत दिखाई देता था आंख बंद करने के बाद उस पार सूक्ष्म जगत दिखाई देने लगता था।
रात्रि के ध्यान में मैं एक खुली हुई छत वाली रेलगाड़ी पर यात्रा कर रहा था यात्रा में बांस बल्ली के मकान एक एक कर निकलते जा रहे थे मकानों के पीछे घने जंगल दिखाई दे रहे थे मकान के आगे महिलाएं दरवाजा दीप रहीं थीं छोटे-छोटे बच्चे खेल रहे थे इसी तरह के मकानों की लंबी लाइनें निकलती चली गई ।
प्राचीन काल के मकान महिलाएं बच्चे
, मकानों की बनावट में कोई खास परिवर्तन नहीं आया कहीं पर महिलाएं गोबर के कंडे भी पाथती दिख रहीं थीं तथा साथ में बच्चों का खेलना भी दिख रहा था।
इसके बाद महिलाओं के जल्दी-जल्दी हाथ चलने लगे बच्चों के जल्दी-जल्दी मुंह चलने लगे ऐसा लगता था जैसे वीडियो कैसेट वहुत तेज चला दी गयी हो इसीलिए उनके हाथ पैर तथा मुंह बहुत जल्दी-जल्दी चलते दिख रहे थे।
काफी देर बाद एक पक्का मकान आया उसके बरामदे में एक लड़की नाचती हुई दिख रही थी पहले वह धीरे-धीरे नाचती रही इसके बाद उसका भी नाचना बहुत तेज हो गया है तथा भद्दा लगने लगा लगता था जैसे यहां भी वीडियो कैसेट बहुत तेज चला दी गई हो, सामने पर्दे पर गोलाकार वेलनाकार पिंड भी निकलते जा रहे थे।
दोपहर के बाद ध्यान में सहस्त्रार चक्र की तरफ से एक खुली हुई रेलगाड़ी खिलौनों से भरी हुई चली आ रही थी मैंने उसमें हाथी घोड़ा जिराफ अन्य ऐसे जानवरों की मूर्तियां देखी जो जानवर इस धरती पर नहीं है इसके अलावा और भी हैरतअंगेज तरह की डिजाइन दार मूर्तियां थी। उस गाड़ी पर कोई भी आदमी नहीं दिख रहा था गाड़ी मूलाधार की ओर चली जा रही थी सभी गाड़ियां चलने का एक मुख्य रास्ता वहीं था जिस पर कीचड़ की धारा चली थी इसी मोड़दार रास्ते पर आज्ञा चक्र तक सारे दृश्य मूलाधार से सहस्रार की ओर तथा सहस्त्रार से मूलाधार की ओर चलते हुए दिखाए गए।
यह एक कुंडलिनी चलने का निर्धारित रास्ता है।
दीवाल का रहस्य
रात के समय जैसे ही मैंनें ध्यान करने के लिए अपनी आंखें बंद की तथा अपनी चादर ओढ़ ली नीचे से ऊपर की ओर पहले तो उक्त चादर धीरे-धीरे काली होती गई इसके बाद वह एकदम डिजाइन दार हो गई जबकि मैंने सफेद चादर ओढ़ी हुई थी इसके बाद पूरे परदे पर सफेद प्रकाश फैल गया सामने मैं बीच में टकटकी लगाकर देख रहा था एक आड़ी तिरछी दीवाल का रेखाचित्र हमारे सामने आ रहा था तथा हमें सामने वीच में अपनी दृष्टि लगाने में दिक्कत हो रही थी फिर मैंने उस दीवाल के ऊपर खास ध्यान दिया तो मैंने देखा कि उस दीवाल के रेखा चित्र में पहले तो हमारे सामने सीधी लंबी लंबी दीवार होती थी फिर वह हमारे सामने ही मुड़ने लगती थी। मैंनें आंखें खोलकर देखा हमारे सामने दाएं तरफ बैरक की दीवाल थी, पुन: मैंने अपनी आंखें बंद कीं वह दीवाल दाएं से बाएं ओर को मुड़ रही थी।
दीवाल का रहस्य आगे की कड़ी
अचानक हमारी समझ में दीवाल घूमने का पूरा रहस्य समझ में आ गया यह दीवाल और कुछ नहीं हमारी ही वैरक की दीवाल थी, मैं बैरक के शुरू में ही लेटा हुआ था उसके आगे बैरक दूर तक चली गई थी यहां पर केवल अकेली दीवाल नहीं घूम रही थी बल्कि पूरी बैरक ही घूम रही थी बैरक के घूमने का केंद्र बिंदु में ही था।
रेलगाड़ी का रहस्य
पूरी बैरक ही रेलगाड़ी की तरह चल रही थी कभी वह मूलाधार की ओर चली जाती इसके बाद वह मुड़कर हमारी पूर्व चली आती लेकिन मैं स्वयं भी उसमें सवार रहता तथा उसी से हमें बाहर के दृश्य दिखते। अबकी वार मैंने काफी सतर्कता पूर्वक अपने विश्वास को दृढ़ करने के लिए चलती हुई रेलगाड़ी की तरह वैरक पर अपनी दृष्टि जमाये रखा।
कब रेलगाड़ी के रूप में बैरक चलकर हमारे पास आ गई तथा मैं बैरक के भीतर हो गया हमें पता ही नहीं चला लेकिन अब की बार हमारे देखने का फोकस वैरक की छत की ओर था। यह बड़ा ही हैरान करने वाला है कि जब भी कुंडलिनी को जो दृश्य हमें दिखाना होता था हमारी दृष्टि का फोकस उधर ही सेट होता था।
मेरे सामने बैरक की छत थी लेकिन बैरक की छत बिल्कुल सफेद पुती हुई थी मगर मैं जो देख रहा था उस छत में एक डिजाइन बनी हुई थी तथा छत के हवा देने वाली पंखे की पंखुड़ियां गायब थी बाकी का बचा हुआ पंखे का भाग पर सुंदर सी प्लास्टिक चढ़ी हुई थी पंखा घूम रहा था तथा ऊपर की छत भी दाएं बाएं घूम रही थी, जब मैंने छत को दाएं बाएं घूमते हुए देखा तो मैंने उसके घूमने के चक्करों को गिनना शुरू कर दिया।
छत घूम ही रही थी कि उसके बीच में एक लोहे के सरियों की चौकोर जाली प्रकट हो गई धीरे धीरे उस जाली से एक पीला सा पदार्थ टपकने लगा। मैंने छत के घूमते हुए चक्कर को 13 बार तक गिना इसके बाद गिनना बंद कर दिया। धीरे धीरे जाली सहित छत हमसे दूर होती गई इसका अर्थ था की बैरक मुड़कर वापस जा रही है।
*दौड़ते मकान*
हमें स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि यह कोई रेलगाड़ी नहीं थी बल्कि लंबे चौड़े मकान दौड़ रहे थे हमें एक लंबी चौड़ी बिल्डिंग दिखाई थी लगता था कि यह किसी सरकारी विभाग का मुख्यालय था बिल्डिंग के बरामदे में बहुत से लोग आ जा रहे थे अचानक पता नहीं क्या हुआ कि सभी लोग बदहवास होकर तेजी से दौड़ने लगे इसके बाद वह बिल्डिंग हम से आगे निकल गई।
बिल्डिंग में लगे फोटोग्राफ से आगे कड़ी
बिल्डिंग के पीछे हमने बहुत से लोगों के फोटोग्राफ चिपके हुए देखें यह फोटोग्राफ उसी तरह के थे जैसे कि आकाश से फोटोग्राफ्स की बरसात हुई थी।
हाथ में गदा लिए हुए देवता
दृश्य बदला , हरे भरे खेत दिखाई दे रहे थे, खेतों के किनारे चार पांच व्यक्तियों का एक झुंड घूम रहा था एक पगडंडी पर दो तीन व्यक्ति चले जा रहे थे। यह अभी प्रथम चक्र ही चालू था। हमें अपनी ही बैरक का बरामदा दिखाई दिया , बरामदे में एक बहुत लंबा सा आदमी उस की वेशभूषा देवताओं जैसी थी वह सिर पर मुकुट धारण किए हुए था तथा हाथ में एक गधा लिए हुए चला जा रहा था उस देवता ने हमारी तरफ मुड़कर भी नहीं देखा मैंने सोचा कि यह हनुमान जी तो नहीं है मैंने उनकी पूछ की तरफ देखा मगर उनके पूछ नहीं थी मैं अंदाज नहीं लगा पाया कि यह कौन सा देवता था। धीरे-धीरे वह देवता आग को चला गया।
मूलाधार चक्र की प्रिंटेड कागज की रील
दृश्यों के अलावा बीच-बीच में कई प्रकार के आकाशीय गोलाकार , वेलनाकार पिन्ड तथा अन्य प्रकार की संरचनाएं भी गुजर जाती थी। प्रथम चक्र शुरू होने के तीसरे दिन सुबह अचानक ऊपर की ओर से
दो से 3 इंच चौड़ी एक कागज की रील निकलती चली आ रही है उस पर नीचे की ओर प्रथम मूलाधार चक्र का चार पंखुड़ियों वाला लाल रंग का चक्र छपा हुआ था इसके बाद ऊपर की तरफ 2 देवियों की फोटोग्राफ छपे हुए थे। जब चक्र और देवियों की फोटो आ गई तो मैंने समझा कि अब मूलाधार चक्र पूरा हो गया है।
पीली रंग की निकलती स्प्रिंग
मैंने विचार किया कि मूलाधार चक्र तो पूरा हो ही गया है थोड़ा सा इसके आगे और देख लूं हमारे देखते ही देखते अचानक एक पीले रंग की स्प्रिंग जैसी संरचना निकलने लगी वह स्प्रिंग पहले बेगरे (गैप दार) छल्लों वाली थी, धीरे-धीरे उसके छल्ले घने होते गए। दृश्य देखते देखते मैं बहुत थक गया था इसलिए मैंने दृश्य देखने बंद कर दिये।
स्वाधिष्ठान चक्र की यात्रा
मैंने पुन: जब दृश्य देखने चालू किए तो मैं सोच रहा था कि हमें फिर से पीली स्प्रिंग वाले दृश्य दिखाई देंगे मगर अफसोस कि वह दृश्य निकल चुके थे क्योंकि कुंडलिनी में वीडियो लगातार चालू थे मैं पश्चाताप करके रह गया।
आगे की दृश्य बताने से पहले
कुंडलिनी के बारे में कुछ खास जानकारियां। नंबर 1
जब मूलाधार से कीचड़ की धारा निकलकर मस्तक से होती हुई जमीन पर गिरी तथा जमीन पर चलते हुए जिस रास्ते पर गई वह रास्ता ही कुंडलिनी चलने का मुख्य तथा निर्धारित रास्ता है उसी रास्ते से चलते हुए सारे दृश्य दिखाई देते हैं।
नंबर दो
मस्तक पर दृश्य बाएं से दाएं तथा दाएं से बाएं तरफ को चलते हैं मस्तक के वाएं तरफ सहस्त्रार चक्र है तथा दाएं तरफ मूलाधार चक्र है।
नंबर 3
जब वाई ओर से दाई ओर को कुंडलिनी के दृश्य चलते हैं अर्थात कुंडलिनी चलती है तो साधक भी कुंडलिनी चलने की दिशा में दाएं तरफ धीरे-धीरे घूमता जाता है
कुंडलिनी मूलाधार की तरफ जा कर दृश्टि से ओझल हो जाती है साधक का मुंह उत्तर पश्चिम के कोने में ठहर जाता है, जब कुंडलिनी मूलाधार की तरफ से पुन: मुड़ कर वापस आती है तो साधक का मुंह फिर से उत्तर से पश्चिम की ओर घूमते हुए पश्चिम दक्षिण के कोने में ठहर जाता है जबकि कुंडली सहस्त्रार की ओर चली जाती है। इसी प्रकार साधक का अपनी धुरी पर घूमना जारी रहता है।
स्वाधिष्ठान चक्र की यात्रा में आगे की कहानी
ध्यान करने के लिए ज्यों ही मैं लेट कर सफेद चादर ओढ़ता हूं वैसे ही नीचे की तरफ पैरों की ओर से चादर का रंग धीरे-धीरे काला होता चला जाता है, इसके बाद प्रतिदिन की तरह ही चादर की डिजाइन पूरी तरह बदल जाती है चादर की डिजाइन प्रतिदिन ही नई नई आती हैं।
हमारे ऊपर चावलों का फेंका जाना
चादर के बाद दृश्य बदलता है आकाश में एक घूमता हुआ टेबल फैन जैसा प्रकट हो जाता है उस की पंखुड़ियां तेजी से घूम रही हैं घूमते घूमते ही वह पंखा अचानक एक लकड़ी की बुनी हुई डलिया में परिवर्तित हो जाता है उस डलिया से हमारे ऊपर चावल फेंक दिए जाते हैं, चावल गिरते ही जमीन से हवा के छोटे-छोटे बुलबुले निकलकर वायुमंडल में तैरने लगते हैं इसके बाद उक्त दृश्य गायब हो जाता है।
कुंडलिनी के साथ घूमता ग्राउंड तथा मेला जैसा दृश्य उपस्थित होना
मूलाधार की तरफ से कुंडलिनी एक रेलगाड़ी के रूप में चली आ रही है गाड़ी के चलने से हमारे सामने वाला ग्राउंड तेजी से गाड़ी के दिशा में दाएं से बाएं और को घूमने लगता है घूमते घूमते ही अचानक मेला जैसा दृश्य उपस्थित हो जाता है, उसी ग्राउंड के बीच में एक बड़ा सा तंबू बनने लगता है, इसके बाद उस तंबू के ऊपर रंग बिरंगी छतरिया लगने लगती हैं लेकिन यह सब कोई आदमी नहीं लगाता है बल्कि सारा काम अपने आप ही ऑटोमेटिक रूप से होता है।
इसके बाद सामने एक दरवाजा दिखता है दरवाजे की नीचे से एक चौकोर डंडाकृति ब ट्यूबलाइट जैसी आकृति सफेद रंग का प्रकाश तथा फुलझड़ियां छोड़ते हुए ऊपर दरवाजे की चौखट तक पहुंच कर गायब हो जाती है आगे का दृश्य फिर बदल जाता है।
।
कुंडलिनी जागृत होने पर दिखने वाले दृश्यों की लिस्ट
अगर आपकी कुंडलिनी जागृत है तो कृपया नीचे दी गई कुंडलिनी के देखे गए दृश्यों को देखकर जानकारी दें कि इन दृश्यों के पीछे क्या कहानी घटित हुई?
अगर आप जवाब नहीं दे पाते हैं तब आपकी कुंडलिनी नहीं खुली हुई है कुंडलिनी की मामले में आप भ्रमित हैं।
१ मूलाधार में घूमता हुआ अद्भुत शिवलिंग
२ मूलाधार से निकलती काले गंदे कीचड़ की धारा ।
३ एक रेलगाड़ी (रेलगाड़ी नहीं है लेकिन चलने पर रेलगाड़ी जैसी दिखती है) से यात्रा में दिखते पर्वत पहाड़ ।
४ जब दृश्य देखकर घबराहट बा मृत्यु की आशंका होने लगी ।
५ यात्रा में निकलते प्राचीन काल के मकान बच्चे काम करती महिलाएं।
६ अधिकतम लाल रंग तथा अन्य रंग के अद्भुत द्रश्य।
७. बरामदे में एक नृत्य करती हुई लड़की।
८. गोलाकार वह बेलनाकार निकलते पिन्ड।
९. मूर्तियों से भरी आती हुई रेलगाड़ी।
१०. सामने आती दीवाल का रहस्य।
११. कुंडलिनी के साथ साधक का अपने केंद्र
१२. मकानों का रेलगाड़ी की तरह दौड़ना।
१३. भीड़ भरे दृश्य।
१४. हाथ में गदा लिए जाता एक बहुत लंबा देवता।
१५. चक्र पूरा होने पर ऊपर से नीचे की ओर एक कागज की रील में
चक्र की फोटो के साथ उस चक्र से संबंधित देवी देवताओं की फोटो लिस्ट आना।
१६. ध्यान के लिए चादरा ओढ़ते ही उसका बदलते हुए दिखाई देना।
१७. हमारे ऊपर चावलों का फेंका जाना।
१८. घूमता हुआ ग्राउंड।
१९. आतिशबाजी जैसा दृश्य।
२०. अंतरिक्ष में ब्लैक मैटर के बीच यात्रा।
२१. तारों भरा आकाश।
२२. सर्पाकार गति से चलते तारे।
२३. आकाश से बरसे फोटो में एक लाल शर्ट वाला व्यक्ति।
२४. शिर के बाहरी भाग में लाल रोशनी।
२५. दीपक की रोशनी से हिलती छाया।
२६. विभिन्न जीवो की शोभायात्रा।
२७. जल में लहराता हुआ लाल रंग का सर्प।
२८. एक लाइन में एक ही शक्ल के 5 या 7 पानी में तैरते व्यक्ति।
२९. चित्र अवस्था में लेटे एक ही शक्ल के 5:00 या 7:00 सरकते हुए व्यक्ति।
३०. रेगते हुए काले सर्प
कुंडलिनी चक्रों में देखे गए दृश्यों की दूसरी लिस्ट
३१. पीले पदार्थ से भरी छोटी बड़ी तीन क्रेड
३२. खिलता हुआ कमल।
३३. बिल्डिंग का नक्शा बदलना।
३५. जेल पेशी पर हमारी गाड़ी के साथ चल रही एक अन्य गाड़ी।
३६. हमारी गाड़ी का भीतरी नक्शा बदलना।
३७. प्रकाश से निर्मित होती वस्तुएं।
३८. बच्चों से भरा हुआ कमरा।
३९. तेज होता अनाहत न और लट्ठे का दृश्य।
४०. काले सर्पों से भरा कमरा
४१. सांसो पर ध्यान
४२. सट्टे का नंबर मांगने पर अंक शास्त्र का हैरतअंगेज चार्ट जिसमें नंबर घूम रहे थे।
४३. आंखें बंद कर भी बाहर का सव कुछ देखने की दृष्टि मिली।
४४. कहीं अनजाने व्यक्तियों के एक एक कर फोटोग्राफ़ो का निकलना।
४५. काले सर्प के फन पर खड़ी एक अर्ध नग्न लड़की।
४६. आकाशीय बंगला।
४७. तीन लोकों की यात्रा।
४८. अनंत आकाश की ओर जाते इस वृक्ष व मकान।
४९. अट्टालिका की खिड़की से निकलता प्रकाश।
५०. चलते हुए बिस्तर।
५१. कुंडलिनी का जंक्शन।
५२. देवताओं के बाहनो का आना
काला कुत्ता
कौवा या कौवा जैसा पक्षी
५३. हमारे पास बैठने वाला बगैर शरीर का अद्भुत व्यक्ति।
५५. एक ही शक्ल के हाथ में कुल्हाड़ी लिए हुए लगभग पांच काली दाढ़ी वाले बाबा।
५६. ब्लैक एनर्जी से होता ब्रम्हांड का निर्माण ब्रह्मांड निर्माण की बिग बैंग थ्योरी गलत है।
५७. सारे ग्रहों का होता निर्माण
५८. मुकुट का होता निर्माण।
५९. अद्भुत जुगनू।
६०. अद्भुत खुशबू।
६१. तीन दिन पूर्णिमा की रात।
६२. ध्यान में होता सूर्य ग्रहण।
६३. चक्कर लगाते ग्रहों के बाहन।
६४. टप टप करके टपकता अमृत।
६५. सहस्त्रार की ओर जाने का अद्भुत अनुभव और घबराहट।
६६. सिर के ऊपर बनता पत्तीदार सहस्त्रार ।
६७. सट्टा नंबर प्राप्त करने का अद्भुत अंक शास्त्र का चार्ट।
६८. हमारे सिर में भैंसा जैसे बड़े-बड़े सीग निकले।
६९. स्वास पर ध्यान दिया तो एक लंबा लट्ठा प्रगट हुआ जिसके ऊपर मैं बैठा हुआ था तथा लट्ठे के नीचे भी मैं ही खड़ा हुआ था नीचे मैं छोटा सा दिखाई दे रहा था।
७०. पूर्व कहानी में आसमान से उत्तरे पांच देवता जिनके शरीर कठपुतलों जैसे थे।
७१. कठपुतले देवताओं की आसमान में सभा।
क्या आपकी कुंडलिनी जागृत है? अगर आप हमारे इन प्रश्नों का जवाब नहीं दे पाते हैं तो आपकी कुंडलिनी जागृत नहीं है।
प्रश्न नंबर 1—
कुंडली चलने का एक मुख्य पर निर्धारित रास्ता है यह रास्ता मोड़दार है मूलाधार से लेकर आज्ञा चक्र तक सारे दृश्य इसी रास्ते से होकर चलते हैं उस रास्ते का रेखा चित्र बनाएं।
नंबर दो--
मूलाधार से जब कीचड़ की धारा निकली तो रास्ते में मिलने वाले तीन कच्चे मकान कहां पर बने थे। नंबर 3
जब कोई दृश्य निकलते हैं अर्थात कुंडलिनी चलती है तो कुंडलिनी चलने के साथ-साथ देखने वाला साधक भी अपनी दूरी पर घूमता है साधक के घूमने के कोंण के बारे में बताएं।
नंबर ४ साधक के सामने का ग्राउंड कैसे घूमता है?
नंबर 5
कुंडलिनी में जो चलती हुई रेलगाड़ी जैसी दिखती है बताएं वह क्या दौड़ता है?
नंबर 6
कुंडलिनी मूलाधार बा सहस्त्रार की ओर जाकर वापस आने के लिए कैसे मुड़ती है, मुड़ने का रेखा चित्र बनाएं।
नंबर 7
ब्लैक मैटर से गुजरने की यात्रा का अनुभव बताएं।
नंबर 8
पीली पदार्थ से तीन क्रेडो का आगे क्या हुआ?
नंबर 9
काले सर्पों से भरे हुए कमरे में सर्पों की सैटिंग किस प्रकार के क्रम में है?
नंबर 10
सर्प के फन पर खड़ी हुई लगभग 18 वर्ष की लड़की के कपड़े कैसे हैं?
नंबर 11
आकाशीय बंगला बनने की घटना कैसे हुई?
नंबर 12
ब्लैक इनर्जी से तारों व ब्रम्हांड का निर्माण कैसे होता है?
नंबर १३
अद्भुत जुगनू का क्या कार्य है?
नंबर 14
तीसरे नेत्र का अपने प्राचीन ग्रंथों में क्या रोल है?
नंबर १५
विभिन्न जीवो की शोभायात्रा में कौन-कौन से जीव सम्मिलित थे?
नंबर 16
सिर पर हजार पंखुड़ी वाला पत्तरीदार शून्य चक्र/सहस्त्रार चक्र वनने की घटना कैसे घटित हुई?
आगे की कहानी कुंडलिनी दिनांक २३-३-२०२२
कुंडलिनी जागृत होने का दुनिया का पहला अनुभव
पिछली कहानी में हमारे मस्तक पर एक चक्र तेजी से घूमने लगा घूमते घूमते अचानक वह वहां से गायब हो गया चक्र की जगह एक छिद्र(होल) बन गया उस छिद्र से देखने पर ऐसा दिखता था कि मैं किसी दूरबीन से देख रहा हूं हमें नीला आकाश स्पष्ट दिखाई दे रहा था धीरे-धीरे उस छिद्र से गोल दिखने वाला आकाश पास आता गया और उस आकाश का दायरा भी बढ़ता गया इसके बाद पूरे पर्दे पर आकाश फैल गया आकाश में दो विमान उड़ रहे थे एक विमान बिल्कुल हमारे पास से ही हवा में ऊपर उठ रहा था। यहीं पर मैंने ध्यान वन्दे कर दिया था।
उसी रात खाना खाने के बाद जब मैं ध्यान के लिए लेटा और अपनी आंखें बंद की प्रतिदिन की तरह हमारे सिर के कई हिस्से , भौंहों के किनारे तथा सहस्त्रार चक्र से लेकर मूलाधार तक सारे चक्र तेजी से कंपन करते दिखाई दे रहे थे इसके बाद सामने के पर्दे पर प्रकाश फैल गया सामने का पूरा ग्राउंड दाएं बाएं घूमने लगा मैंने देखा कि अचानक एक गीली मिट्टी का पतला सा डेढ़ फुट लंबा तथा लगभग दो इंच चौड़ा एक शिवलिंग अपनी धुरी पर तेजी से घूम रहा था वह ऐसे घूम रहा था जैसे किसी कुम्हार के चाक पर घूम रहा हो
गीली मिट्टी का होने के कारण उसका पानी स्पष्ट रूप से छलक रहा था उसके नीचे लाल फूल पड़े हुए थे घूमते घूमते वह शिवलिंग गायब हो गया अब वहां पर एक पत्थर का शिवलिंग प्रगट हो गया उसका एक चबूतरा भी बना हुआ था वह भी शिवलिंग चबूतरा सहित घूम रहा था।
गंदा कीचड़ और उसकी धारा
और भी हमें कुछ दृश्य दिखाई दिये लेकिन मैं ध्यान नहीं कर पाया अचानक मुझे महसूस हुआ कि हमारे नाभि के नीचे के हिस्से पर किसी ने गंदा कीचड़ डाल दिया हो वह गंदा व काला कीचड़ हमारे पेट के ऊपर सीने के बीच से होते हुए मुंह नाक तथा मस्तक के ऊपर बीच से बहते हुए हमारे शिर के ऊपर से इस तरह नीचे गिरने लगा जैसे शिवजी के शिर से गंगा निकलकर नीचे गिर रहीं हैं।
मुझे दिखाई दिया कि उक्त गिरने वाली कीचड़ की धारा ऊपर से नीचे की तरफ वृक्षों के झुंड के बीच से होकर बहती जा रही है, मैंने जब धारा की तरफ ध्यान से देखा तो मैं हैरान रह गया क्योंकि उस धारा के साथ नीचे की जमीन भी धीरे-धीरे धारा के साथ आगे को सरकती जा रही थी ।
धारा और तीन कच्चे मकान
जब धारा नीचे की तरफ पहुंची तो वहां एक मोड़ पर तीन कच्चे मकान बने हुए थे मैंने देखा की उस धारा के साथ तेजी से एक मकान आगे जाकर ढह गया इसी तरह एक एक कर तीनों मकान जमीन में मिल गए इसके बाद उक्त धारा किधर को चली गई मैं देख नहीं पाया।
रेलगाड़ी पर यात्रा देखने वाले पर्वत और पहाड़
इसके बाद मुझे दिखाई दिया कि मैं एक खुली हुई छत वाली रेलगाड़ी पर सवार हूं और रेलगाड़ी तेजी से आगे को चली जा रही है छोटे-छोटे पर्वत पहाड़ सामने से निकलते चले जा रहे हैं एक पहाड़ मैंने बहुत ऊंचा देखा इतना ऊंचा गगनचुंबी पहाड़ देखकर मुझे भय सा लगने लगा। मैंने अपने हाथ पैरों को टटोला कि कहीं में सपना तो नहीं देखने लगा हूं लेकिन मैं सपना नहीं देख रहा था मैं जागृत अवस्था में था।
अचानक मुझे महसूस हुआ कि मेरे शरीर का एक हिस्सा आकाश की ओर ऊपर उठता जा रहा है तथा मैंने दूसरी ओर देखा तू मेरा दूसरा हिस्सा भी ऊपर की ओर जा रहा था मुझे आशंका होने लगी कि कहीं हमारी मृत्यु तो नहीं हो रही है मेरे दिमाग में बुरी तरह घबराहट फैल गई मेरा सारा शरीर कांपने लगा मैंने सोचा कि अगर मैं इसी तरह इस गाड़ी पर यात्रा करता रहा और हमें जरा सी भी झपकी आ गई गाड़ी से मैं किस जगह उतर जाऊं फिर मैं वापस भी नहीं आ सकता तब मेरी मृत्यु निश्चित है किसी घबराहट में मैंने ध्यान बंद कर दिया और अपनी ओढ़ी हुई चादर को अलग हटा दिया।
मैं दिन में भी पूरे दिन ध्यान करता रहा था तथा अब काफी रात भी हो गई थी मुझे बहुत तेज नींद भी लगी हुई थी लेकिन एक बार जब कुंडलिनी चलना शुरू हुई तो अब वह बंद नहीं हो रही थी, मैं उठ कर बैठ गया उस दिन हमारे पास पीने के लिए बीड़ी बंडल भी नहीं था मैं तुरंत ही एक बीड़ी बेचने वाले व्यक्ति को जगा कर उससे एक बंडल खरीद लाया मैंने लगातार तीन चार बीड़ी फूंक डाली मैंने आंख बंद कर पुन: देखा तो हमें दिखाई दिया कि हमारी कुंडलिनी में दृश्य चल रहे हैं,
हमारे पूरे शरीर में सन्नाटा सा छाया हुआ था हमें ऐसा महसूस हो रहा था जैसे हमने अत्यधिक भांग का नशा किया हुआ हो हमारी जान पर अटकी हुई थी घबराहट हमें दृश्य देखकर नहीं हो रही थी बल्कि हमें नींद के कारण भय हो रहा था कि कहीं मैं सो गया तो मृत्यु हमारी निश्चित है, स्वप्न में अगर मैं गाड़ी से उतर गया और बैठने का ख्याल ना रहा तब तो मरना निश्चित ही है मुझे कोई उपाय नहीं सूझ रहा था।
कुंडलिनी शुरू हो गई तो वह बंद नहीं हो रही थी हमारे पास नींद लेने तक का मौका नहीं था
मैं महामृत्युंजय का जाप करने लगा धीरे-धीरे हमारी हिम्मत बढ़ी और मैं फिर से ध्यान करने के लिए लेट गया और रात भर दृश्य देखता रहा।
सहस्त्रार चक्र की ओर से एक रेलगाड़ी मूलाधार की ओर चली आई और उसके सामने लगे दो मोटे मोटे पाइपों से तेजी से पानी निकलने लगा मुझे समझ में आया कि यह अब मूलाधार की धुलाई हो रही है।
रात जैसे तैसे गुजरी दूसरा दिन शुरू हुआ लेकिन कुंडलिनी जो एक बार शुरू हो गई थी अब विराम करने तक का समय नहीं दे रही थी हमारी नींद के कारण हालत खराब हो रही थी अपनी समस्या बताए तो किसे बताएं इसका कोई जानकार गुरु भी नहीं था जिससे अपनी बात कहें इस संबंध में पहले से कोई इस तरह की घटना मैंने किसी पुस्तक में भी नहीं पढ़ी थी ।
मुझे कुंडलिनी के वारे में पूरी तरह जानकारी भी नहीं थी तथा इस तरह की घटना घटित हो जायेगी ,मैंने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी। मै वार वार प्रार्थना
कर रहा था कि दो तीन घंटे के लिये कुंडलिनी रुक जाते तो मैं नींद लें लूं इसके वाद फिर कुंडलिनी खूब चलती रहे लेकिन कुंडलिनी नहीं रुकीं उसका चौबीस घंटे चलना जारी रहा।
पूरे दिन मैं लेटा हुआ दृश्य देखता रहा रात्रि को मैंने बहुत ही सुंदर व अद्भुत रंग-बिरंगे सर्पों के दृश्य देखे मुझे पिछली रात्रि के भय से बड़ी ही राहत महसूस हुई।
लेकिन पता नहीं क्या हुआ कि उस रात के सारे दृश्य हमारे दिमाग से डिलीट हो गए कुछ भी याद नहीं पड़ रहा है।
इस समय मैं किस चक्र में चल रहा था मुझे कुछ भी पता नहीं है।
प्रथम चक्र मूलाधार चक्र की यात्रा
अब मैं थोड़ी बहुत देर को ही अपनी बैरक से बाहर निकलता था अन्यथा लेट कर दृश्य देखता रहता था अब तो दृश्य देखने के लिए चलते फिरते भी हमें आंखें बंद करने पर दृश्य दिखाई देने लगते थे खुली आंखों के इस पार भौतिक जगत दिखाई देता था आंख बंद करने के बाद उस पार सूक्ष्म जगत दिखाई देने लगता था।
रात्रि के ध्यान में मैं एक खुली हुई छत वाली रेलगाड़ी पर यात्रा कर रहा था यात्रा में बांस बल्ली के मकान एक एक कर निकलते जा रहे थे मकानों के पीछे घने जंगल दिखाई दे रहे थे मकान के आगे महिलाएं दरवाजा दीप रहीं थीं छोटे-छोटे बच्चे खेल रहे थे इसी तरह के मकानों की लंबी लाइनें निकलती चली गई ।
प्राचीन काल के मकान महिलाएं बच्चे
, मकानों की बनावट में कोई खास परिवर्तन नहीं आया कहीं पर महिलाएं गोबर के कंडे भी पाथती दिख रहीं थीं तथा साथ में बच्चों का खेलना भी दिख रहा था।
इसके बाद महिलाओं के जल्दी-जल्दी हाथ चलने लगे बच्चों के जल्दी-जल्दी मुंह चलने लगे ऐसा लगता था जैसे वीडियो कैसेट वहुत तेज चला दी गयी हो इसीलिए उनके हाथ पैर तथा मुंह बहुत जल्दी-जल्दी चलते दिख रहे थे।
काफी देर बाद एक पक्का मकान आया उसके बरामदे में एक लड़की नाचती हुई दिख रही थी पहले वह धीरे-धीरे नाचती रही इसके बाद उसका भी नाचना बहुत तेज हो गया है तथा भद्दा लगने लगा लगता था जैसे यहां भी वीडियो कैसेट बहुत तेज चला दी गई हो, सामने पर्दे पर गोलाकार वेलनाकार पिंड भी निकलते जा रहे थे।
दोपहर के बाद ध्यान में सहस्त्रार चक्र की तरफ से एक खुली हुई रेलगाड़ी खिलौनों से भरी हुई चली आ रही थी मैंने उसमें हाथी घोड़ा जिराफ अन्य ऐसे जानवरों की मूर्तियां देखी जो जानवर इस धरती पर नहीं है इसके अलावा और भी हैरतअंगेज तरह की डिजाइन दार मूर्तियां थी। उस गाड़ी पर कोई भी आदमी नहीं दिख रहा था गाड़ी मूलाधार की ओर चली जा रही थी सभी गाड़ियां चलने का एक मुख्य रास्ता वहीं था जिस पर कीचड़ की धारा चली थी इसी मोड़दार रास्ते पर आज्ञा चक्र तक सारे दृश्य मूलाधार से सहस्रार की ओर तथा सहस्त्रार से मूलाधार की ओर चलते हुए दिखाए गए।
यह एक कुंडलिनी चलने का निर्धारित रास्ता है।
दीवाल का रहस्य
रात के समय जैसे ही मैंनें ध्यान करने के लिए अपनी आंखें बंद की तथा अपनी चादर ओढ़ ली नीचे से ऊपर की ओर पहले तो उक्त चादर धीरे-धीरे काली होती गई इसके बाद वह एकदम डिजाइन दार हो गई जबकि मैंने सफेद चादर ओढ़ी हुई थी इसके बाद पूरे परदे पर सफेद प्रकाश फैल गया सामने मैं बीच में टकटकी लगाकर देख रहा था एक आड़ी तिरछी दीवाल का रेखाचित्र हमारे सामने आ रहा था तथा हमें सामने वीच में अपनी दृष्टि लगाने में दिक्कत हो रही थी फिर मैंने उस दीवाल के ऊपर खास ध्यान दिया तो मैंने देखा कि उस दीवाल के रेखा चित्र में पहले तो हमारे सामने सीधी लंबी लंबी दीवार होती थी फिर वह हमारे सामने ही मुड़ने लगती थी। मैंनें आंखें खोलकर देखा हमारे सामने दाएं तरफ बैरक की दीवाल थी, पुन: मैंने अपनी आंखें बंद कीं वह दीवाल दाएं से बाएं ओर को मुड़ रही थी।
दीवाल का रहस्य आगे की कड़ी
अचानक हमारी समझ में दीवाल घूमने का पूरा रहस्य समझ में आ गया यह दीवाल और कुछ नहीं हमारी ही वैरक की दीवाल थी, मैं बैरक के शुरू में ही लेटा हुआ था उसके आगे बैरक दूर तक चली गई थी यहां पर केवल अकेली दीवाल नहीं घूम रही थी बल्कि पूरी बैरक ही घूम रही थी बैरक के घूमने का केंद्र बिंदु में ही था।
रेलगाड़ी का रहस्य
पूरी बैरक ही रेलगाड़ी की तरह चल रही थी कभी वह मूलाधार की ओर चली जाती इसके बाद वह मुड़कर हमारी पूर्व चली आती लेकिन मैं स्वयं भी उसमें सवार रहता तथा उसी से हमें बाहर के दृश्य दिखते। अबकी वार मैंने काफी सतर्कता पूर्वक अपने विश्वास को दृढ़ करने के लिए चलती हुई रेलगाड़ी की तरह वैरक पर अपनी दृष्टि जमाये रखा।
कब रेलगाड़ी के रूप में बैरक चलकर हमारे पास आ गई तथा मैं बैरक के भीतर हो गया हमें पता ही नहीं चला लेकिन अब की बार हमारे देखने का फोकस वैरक की छत की ओर था। यह बड़ा ही हैरान करने वाला है कि जब भी कुंडलिनी को जो दृश्य हमें दिखाना होता था हमारी दृष्टि का फोकस उधर ही सेट होता था।
मेरे सामने बैरक की छत थी लेकिन बैरक की छत बिल्कुल सफेद पुती हुई थी मगर मैं जो देख रहा था उस छत में एक डिजाइन बनी हुई थी तथा छत के हवा देने वाली पंखे की पंखुड़ियां गायब थी बाकी का बचा हुआ पंखे का भाग पर सुंदर सी प्लास्टिक चढ़ी हुई थी पंखा घूम रहा था तथा ऊपर की छत भी दाएं बाएं घूम रही थी, जब मैंने छत को दाएं बाएं घूमते हुए देखा तो मैंने उसके घूमने के चक्करों को गिनना शुरू कर दिया।
छत घूम ही रही थी कि उसके बीच में एक लोहे के सरियों की चौकोर जाली प्रकट हो गई धीरे धीरे उस जाली से एक पीला सा पदार्थ टपकने लगा। मैंने छत के घूमते हुए चक्कर को 13 बार तक गिना इसके बाद गिनना बंद कर दिया। धीरे धीरे जाली सहित छत हमसे दूर होती गई इसका अर्थ था की बैरक मुड़कर वापस जा रही है।
*दौड़ते मकान*
हमें स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि यह कोई रेलगाड़ी नहीं थी बल्कि लंबे चौड़े मकान दौड़ रहे थे हमें एक लंबी चौड़ी बिल्डिंग दिखाई थी लगता था कि यह किसी सरकारी विभाग का मुख्यालय था बिल्डिंग के बरामदे में बहुत से लोग आ जा रहे थे अचानक पता नहीं क्या हुआ कि सभी लोग बदहवास होकर तेजी से दौड़ने लगे इसके बाद वह बिल्डिंग हम से आगे निकल गई।
बिल्डिंग में लगे फोटोग्राफ से आगे कड़ी
बिल्डिंग के पीछे हमने बहुत से लोगों के फोटोग्राफ चिपके हुए देखें यह फोटोग्राफ उसी तरह के थे जैसे कि आकाश से फोटोग्राफ्स की बरसात हुई थी।
हाथ में गदा लिए हुए देवता
दृश्य बदला , हरे भरे खेत दिखाई दे रहे थे, खेतों के किनारे चार पांच व्यक्तियों का एक झुंड घूम रहा था एक पगडंडी पर दो तीन व्यक्ति चले जा रहे थे। यह अभी प्रथम चक्र ही चालू था। हमें अपनी ही बैरक का बरामदा दिखाई दिया , बरामदे में एक बहुत लंबा सा आदमी उस की वेशभूषा देवताओं जैसी थी वह सिर पर मुकुट धारण किए हुए था तथा हाथ में एक गधा लिए हुए चला जा रहा था उस देवता ने हमारी तरफ मुड़कर भी नहीं देखा मैंने सोचा कि यह हनुमान जी तो नहीं है मैंने उनकी पूछ की तरफ देखा मगर उनके पूछ नहीं थी मैं अंदाज नहीं लगा पाया कि यह कौन सा देवता था। धीरे-धीरे वह देवता आग को चला गया।
मूलाधार चक्र की प्रिंटेड कागज की रील
दृश्यों के अलावा बीच-बीच में कई प्रकार के आकाशीय गोलाकार , वेलनाकार पिन्ड तथा अन्य प्रकार की संरचनाएं भी गुजर जाती थी। प्रथम चक्र शुरू होने के तीसरे दिन सुबह अचानक ऊपर की ओर से
दो से 3 इंच चौड़ी एक कागज की रील निकलती चली आ रही है उस पर नीचे की ओर प्रथम मूलाधार चक्र का चार पंखुड़ियों वाला लाल रंग का चक्र छपा हुआ था इसके बाद ऊपर की तरफ 2 देवियों की फोटोग्राफ छपे हुए थे। जब चक्र और देवियों की फोटो आ गई तो मैंने समझा कि अब मूलाधार चक्र पूरा हो गया है।
पीली रंग की निकलती स्प्रिंग
मैंने विचार किया कि मूलाधार चक्र तो पूरा हो ही गया है थोड़ा सा इसके आगे और देख लूं हमारे देखते ही देखते अचानक एक पीले रंग की स्प्रिंग जैसी संरचना निकलने लगी वह स्प्रिंग पहले बेगरे (गैप दार) छल्लों वाली थी, धीरे-धीरे उसके छल्ले घने होते गए। दृश्य देखते देखते मैं बहुत थक गया था इसलिए मैंने दृश्य देखने बंद कर दिये।
स्वाधिष्ठान चक्र की यात्रा
मैंने पुन: जब दृश्य देखने चालू किए तो मैं सोच रहा था कि हमें फिर से पीली स्प्रिंग वाले दृश्य दिखाई देंगे मगर अफसोस कि वह दृश्य निकल चुके थे क्योंकि कुंडलिनी में वीडियो लगातार चालू थे मैं पश्चाताप करके रह गया।
आगे की दृश्य बताने से पहले
कुंडलिनी के बारे में कुछ खास जानकारियां। नंबर 1
जब मूलाधार से कीचड़ की धारा निकलकर मस्तक से होती हुई जमीन पर गिरी तथा जमीन पर चलते हुए जिस रास्ते पर गई वह रास्ता ही कुंडलिनी चलने का मुख्य तथा निर्धारित रास्ता है उसी रास्ते से चलते हुए सारे दृश्य दिखाई देते हैं।
नंबर दो
मस्तक पर दृश्य बाएं से दाएं तथा दाएं से बाएं तरफ को चलते हैं मस्तक के वाएं तरफ सहस्त्रार चक्र है तथा दाएं तरफ मूलाधार चक्र है।
नंबर 3
जब वाई ओर से दाई ओर को कुंडलिनी के दृश्य चलते हैं अर्थात कुंडलिनी चलती है तो साधक भी कुंडलिनी चलने की दिशा में दाएं तरफ धीरे-धीरे घूमता जाता है
कुंडलिनी मूलाधार की तरफ जा कर दृश्टि से ओझल हो जाती है साधक का मुंह उत्तर पश्चिम के कोने में ठहर जाता है, जब कुंडलिनी मूलाधार की तरफ से पुन: मुड़ कर वापस आती है तो साधक का मुंह फिर से उत्तर से पश्चिम की ओर घूमते हुए पश्चिम दक्षिण के कोने में ठहर जाता है जबकि कुंडली सहस्त्रार की ओर चली जाती है। इसी प्रकार साधक का अपनी धुरी पर घूमना जारी रहता है।
स्वाधिष्ठान चक्र की यात्रा में आगे की कहानी
ध्यान करने के लिए ज्यों ही मैं लेट कर सफेद चादर ओढ़ता हूं वैसे ही नीचे की तरफ पैरों की ओर से चादर का रंग धीरे-धीरे काला होता चला जाता है, इसके बाद प्रतिदिन की तरह ही चादर की डिजाइन पूरी तरह बदल जाती है चादर की डिजाइन प्रतिदिन ही नई नई आती हैं।
हमारे ऊपर चावलों का फेंका जाना
चादर के बाद दृश्य बदलता है आकाश में एक घूमता हुआ टेबल फैन जैसा प्रकट हो जाता है उस की पंखुड़ियां तेजी से घूम रही हैं घूमते घूमते ही वह पंखा अचानक एक लकड़ी की बुनी हुई डलिया में परिवर्तित हो जाता है उस डलिया से हमारे ऊपर चावल फेंक दिए जाते हैं, चावल गिरते ही जमीन से हवा के छोटे-छोटे बुलबुले निकलकर वायुमंडल में तैरने लगते हैं इसके बाद उक्त दृश्य गायब हो जाता है।
कुंडलिनी के साथ घूमता ग्राउंड तथा मेला जैसा दृश्य उपस्थित होना
मूलाधार की तरफ से कुंडलिनी एक रेलगाड़ी के रूप में चली आ रही है गाड़ी के चलने से हमारे सामने वाला ग्राउंड तेजी से गाड़ी के दिशा में दाएं से बाएं और को घूमने लगता है घूमते घूमते ही अचानक मेला जैसा दृश्य उपस्थित हो जाता है, उसी ग्राउंड के बीच में एक बड़ा सा तंबू बनने लगता है, इसके बाद उस तंबू के ऊपर रंग बिरंगी छतरिया लगने लगती हैं लेकिन यह सब कोई आदमी नहीं लगाता है बल्कि सारा काम अपने आप ही ऑटोमेटिक रूप से होता है।
इसके बाद सामने एक दरवाजा दिखता है दरवाजे की नीचे से एक चौकोर डंडाकृति ब ट्यूबलाइट जैसी आकृति सफेद रंग का प्रकाश तथा फुलझड़ियां छोड़ते हुए ऊपर दरवाजे की चौखट तक पहुंच कर गायब हो जाती है आगे का दृश्य फिर बदल जाता है।
।
कुंडलिनी जागृत होने पर दिखने वाले दृश्यों की लिस्ट
अगर आपकी कुंडलिनी जागृत है तो कृपया नीचे दी गई कुंडलिनी के देखे गए दृश्यों को देखकर जानकारी दें कि इन दृश्यों के पीछे क्या कहानी घटित हुई?
अगर आप जवाब नहीं दे पाते हैं तब आपकी कुंडलिनी नहीं खुली हुई है कुंडलिनी की मामले में आप भ्रमित हैं।
१ मूलाधार में घूमता हुआ अद्भुत शिवलिंग
२ मूलाधार से निकलती काले गंदे कीचड़ की धारा ।
३ एक रेलगाड़ी (रेलगाड़ी नहीं है लेकिन चलने पर रेलगाड़ी जैसी दिखती है) से यात्रा में दिखते पर्वत पहाड़ ।
४ जब दृश्य देखकर घबराहट बा मृत्यु की आशंका होने लगी ।
५ यात्रा में निकलते प्राचीन काल के मकान बच्चे काम करती महिलाएं।
६ अधिकतम लाल रंग तथा अन्य रंग के अद्भुत द्रश्य।
७. बरामदे में एक नृत्य करती हुई लड़की।
८. गोलाकार वह बेलनाकार निकलते पिन्ड।
९. मूर्तियों से भरी आती हुई रेलगाड़ी।
१०. सामने आती दीवाल का रहस्य।
११. कुंडलिनी के साथ साधक का अपने केंद्र
१२. मकानों का रेलगाड़ी की तरह दौड़ना।
१३. भीड़ भरे दृश्य।
१४. हाथ में गदा लिए जाता एक बहुत लंबा देवता।
१५. चक्र पूरा होने पर ऊपर से नीचे की ओर एक कागज की रील में
चक्र की फोटो के साथ उस चक्र से संबंधित देवी देवताओं की फोटो लिस्ट आना।
१६. ध्यान के लिए चादरा ओढ़ते ही उसका बदलते हुए दिखाई देना।
१७. हमारे ऊपर चावलों का फेंका जाना।
१८. घूमता हुआ ग्राउंड।
१९. आतिशबाजी जैसा दृश्य।
२०. अंतरिक्ष में ब्लैक मैटर के बीच यात्रा।
२१. तारों भरा आकाश।
२२. सर्पाकार गति से चलते तारे।
२३. आकाश से बरसे फोटो में एक लाल शर्ट वाला व्यक्ति।
२४. शिर के बाहरी भाग में लाल रोशनी।
२५. दीपक की रोशनी से हिलती छाया।
२६. विभिन्न जीवो की शोभायात्रा।
२७. जल में लहराता हुआ लाल रंग का सर्प।
२८. एक लाइन में एक ही शक्ल के 5 या 7 पानी में तैरते व्यक्ति।
२९. चित्र अवस्था में लेटे एक ही शक्ल के 5:00 या 7:00 सरकते हुए व्यक्ति।
३०. रेगते हुए काले सर्प
कुंडलिनी चक्रों में देखे गए दृश्यों की दूसरी लिस्ट
३१. पीले पदार्थ से भरी छोटी बड़ी तीन क्रेड
३२. खिलता हुआ कमल।
३३. बिल्डिंग का नक्शा बदलना।
३५. जेल पेशी पर हमारी गाड़ी के साथ चल रही एक अन्य गाड़ी।
३६. हमारी गाड़ी का भीतरी नक्शा बदलना।
३७. प्रकाश से निर्मित होती वस्तुएं।
३८. बच्चों से भरा हुआ कमरा।
३९. तेज होता अनाहत न और लट्ठे का दृश्य।
४०. काले सर्पों से भरा कमरा
४१. सांसो पर ध्यान
४२. सट्टे का नंबर मांगने पर अंक शास्त्र का हैरतअंगेज चार्ट जिसमें नंबर घूम रहे थे।
४३. आंखें बंद कर भी बाहर का सव कुछ देखने की दृष्टि मिली।
४४. कहीं अनजाने व्यक्तियों के एक एक कर फोटोग्राफ़ो का निकलना।
४५. काले सर्प के फन पर खड़ी एक अर्ध नग्न लड़की।
४६. आकाशीय बंगला।
४७. तीन लोकों की यात्रा।
४८. अनंत आकाश की ओर जाते इस वृक्ष व मकान।
४९. अट्टालिका की खिड़की से निकलता प्रकाश।
५०. चलते हुए बिस्तर।
५१. कुंडलिनी का जंक्शन।
५२. देवताओं के बाहनो का आना
काला कुत्ता
कौवा या कौवा जैसा पक्षी
५३. हमारे पास बैठने वाला बगैर शरीर का अद्भुत व्यक्ति।
५५. एक ही शक्ल के हाथ में कुल्हाड़ी लिए हुए लगभग पांच काली दाढ़ी वाले बाबा।
५६. ब्लैक एनर्जी से होता ब्रम्हांड का निर्माण ब्रह्मांड निर्माण की बिग बैंग थ्योरी गलत है।
५७. सारे ग्रहों का होता निर्माण
५८. मुकुट का होता निर्माण।
५९. अद्भुत जुगनू।
६०. अद्भुत खुशबू।
६१. तीन दिन पूर्णिमा की रात।
६२. ध्यान में होता सूर्य ग्रहण।
६३. चक्कर लगाते ग्रहों के बाहन।
६४. टप टप करके टपकता अमृत।
६५. सहस्त्रार की ओर जाने का अद्भुत अनुभव और घबराहट।
६६. सिर के ऊपर बनता पत्तीदार सहस्त्रार ।
६७. सट्टा नंबर प्राप्त करने का अद्भुत अंक शास्त्र का चार्ट।
६८. हमारे सिर में भैंसा जैसे बड़े-बड़े सीग निकले।
६९. स्वास पर ध्यान दिया तो एक लंबा लट्ठा प्रगट हुआ जिसके ऊपर मैं बैठा हुआ था तथा लट्ठे के नीचे भी मैं ही खड़ा हुआ था नीचे मैं छोटा सा दिखाई दे रहा था।
७०. पूर्व कहानी में आसमान से उत्तरे पांच देवता जिनके शरीर कठपुतलों जैसे थे।
७१. कठपुतले देवताओं की आसमान में सभा।
क्या आपकी कुंडलिनी जागृत है? अगर आप हमारे इन प्रश्नों का जवाब नहीं दे पाते हैं तो आपकी कुंडलिनी जागृत नहीं है।
प्रश्न नंबर 1—
कुंडली चलने का एक मुख्य पर निर्धारित रास्ता है यह रास्ता मोड़दार है मूलाधार से लेकर आज्ञा चक्र तक सारे दृश्य इसी रास्ते से होकर चलते हैं उस रास्ते का रेखा चित्र बनाएं।
नंबर दो--
मूलाधार से जब कीचड़ की धारा निकली तो रास्ते में मिलने वाले तीन कच्चे मकान कहां पर बने थे। नंबर 3
जब कोई दृश्य निकलते हैं अर्थात कुंडलिनी चलती है तो कुंडलिनी चलने के साथ-साथ देखने वाला साधक भी अपनी दूरी पर घूमता है साधक के घूमने के कोंण के बारे में बताएं।
नंबर ४ साधक के सामने का ग्राउंड कैसे घूमता है?
नंबर 5
कुंडलिनी में जो चलती हुई रेलगाड़ी जैसी दिखती है बताएं वह क्या दौड़ता है?
नंबर 6
कुंडलिनी मूलाधार बा सहस्त्रार की ओर जाकर वापस आने के लिए कैसे मुड़ती है, मुड़ने का रेखा चित्र बनाएं।
नंबर 7
ब्लैक मैटर से गुजरने की यात्रा का अनुभव बताएं।
नंबर 8
पीली पदार्थ से तीन क्रेडो का आगे क्या हुआ?
नंबर 9
काले सर्पों से भरे हुए कमरे में सर्पों की सैटिंग किस प्रकार के क्रम में है?
नंबर 10
सर्प के फन पर खड़ी हुई लगभग 18 वर्ष की लड़की के कपड़े कैसे हैं?
नंबर 11
आकाशीय बंगला बनने की घटना कैसे हुई?
नंबर 12
ब्लैक इनर्जी से तारों व ब्रम्हांड का निर्माण कैसे होता है?
नंबर १३
अद्भुत जुगनू का क्या कार्य है?
नंबर 14
तीसरे नेत्र का अपने प्राचीन ग्रंथों में क्या रोल है?
नंबर १५
विभिन्न जीवो की शोभायात्रा में कौन-कौन से जीव सम्मिलित थे?
नंबर 16
सिर पर हजार पंखुड़ी वाला पत्तरीदार शून्य चक्र/सहस्त्रार चक्र वनने की घटना कैसे घटित हुई?
आगे की कहानी कुंडलिनी दिनांक २३-३-२०२२
कुंडलिनी जागृत होने का दुनिया का पहला अनुभव
पिछली कहानी में हमारे मस्तक पर एक चक्र तेजी से घूमने लगा घूमते घूमते अचानक वह वहां से गायब हो गया चक्र की जगह एक छिद्र(होल) बन गया उस छिद्र से देखने पर ऐसा दिखता था कि मैं किसी दूरबीन से देख रहा हूं हमें नीला आकाश स्पष्ट दिखाई दे रहा था धीरे-धीरे उस छिद्र से गोल दिखने वाला आकाश पास आता गया और उस आकाश का दायरा भी बढ़ता गया इसके बाद पूरे पर्दे पर आकाश फैल गया आकाश में दो विमान उड़ रहे थे एक विमान बिल्कुल हमारे पास से ही हवा में ऊपर उठ रहा था। यहीं पर मैंने ध्यान वन्दे कर दिया था।
उसी रात खाना खाने के बाद जब मैं ध्यान के लिए लेटा और अपनी आंखें बंद की प्रतिदिन की तरह हमारे सिर के कई हिस्से , भौंहों के किनारे तथा सहस्त्रार चक्र से लेकर मूलाधार तक सारे चक्र तेजी से कंपन करते दिखाई दे रहे थे इसके बाद सामने के पर्दे पर प्रकाश फैल गया सामने का पूरा ग्राउंड दाएं बाएं घूमने लगा मैंने देखा कि अचानक एक गीली मिट्टी का पतला सा डेढ़ फुट लंबा तथा लगभग दो इंच चौड़ा एक शिवलिंग अपनी धुरी पर तेजी से घूम रहा था वह ऐसे घूम रहा था जैसे किसी कुम्हार के चाक पर घूम रहा हो
गीली मिट्टी का होने के कारण उसका पानी स्पष्ट रूप से छलक रहा था उसके नीचे लाल फूल पड़े हुए थे घूमते घूमते वह शिवलिंग गायब हो गया अब वहां पर एक पत्थर का शिवलिंग प्रगट हो गया उसका एक चबूतरा भी बना हुआ था वह भी शिवलिंग चबूतरा सहित घूम रहा था।
गंदा कीचड़ और उसकी धारा
और भी हमें कुछ दृश्य दिखाई दिये लेकिन मैं ध्यान नहीं कर पाया अचानक मुझे महसूस हुआ कि हमारे नाभि के नीचे के हिस्से पर किसी ने गंदा कीचड़ डाल दिया हो वह गंदा व काला कीचड़ हमारे पेट के ऊपर सीने के बीच से होते हुए मुंह नाक तथा मस्तक के ऊपर बीच से बहते हुए हमारे शिर के ऊपर से इस तरह नीचे गिरने लगा जैसे शिवजी के शिर से गंगा निकलकर नीचे गिर रहीं हैं।
मुझे दिखाई दिया कि उक्त गिरने वाली कीचड़ की धारा ऊपर से नीचे की तरफ वृक्षों के झुंड के बीच से होकर बहती जा रही है, मैंने जब धारा की तरफ ध्यान से देखा तो मैं हैरान रह गया क्योंकि उस धारा के साथ नीचे की जमीन भी धीरे-धीरे धारा के साथ आगे को सरकती जा रही थी ।
धारा और तीन कच्चे मकान
जब धारा नीचे की तरफ पहुंची तो वहां एक मोड़ पर तीन कच्चे मकान बने हुए थे मैंने देखा की उस धारा के साथ तेजी से एक मकान आगे जाकर ढह गया इसी तरह एक एक कर तीनों मकान जमीन में मिल गए इसके बाद उक्त धारा किधर को चली गई मैं देख नहीं पाया।
रेलगाड़ी पर यात्रा देखने वाले पर्वत और पहाड़
इसके बाद मुझे दिखाई दिया कि मैं एक खुली हुई छत वाली रेलगाड़ी पर सवार हूं और रेलगाड़ी तेजी से आगे को चली जा रही है छोटे-छोटे पर्वत पहाड़ सामने से निकलते चले जा रहे हैं एक पहाड़ मैंने बहुत ऊंचा देखा इतना ऊंचा गगनचुंबी पहाड़ देखकर मुझे भय सा लगने लगा। मैंने अपने हाथ पैरों को टटोला कि कहीं में सपना तो नहीं देखने लगा हूं लेकिन मैं सपना नहीं देख रहा था मैं जागृत अवस्था में था।
अचानक मुझे महसूस हुआ कि मेरे शरीर का एक हिस्सा आकाश की ओर ऊपर उठता जा रहा है तथा मैंने दूसरी ओर देखा तू मेरा दूसरा हिस्सा भी ऊपर की ओर जा रहा था मुझे आशंका होने लगी कि कहीं हमारी मृत्यु तो नहीं हो रही है मेरे दिमाग में बुरी तरह घबराहट फैल गई मेरा सारा शरीर कांपने लगा मैंने सोचा कि अगर मैं इसी तरह इस गाड़ी पर यात्रा करता रहा और हमें जरा सी भी झपकी आ गई गाड़ी से मैं किस जगह उतर जाऊं फिर मैं वापस भी नहीं आ सकता तब मेरी मृत्यु निश्चित है किसी घबराहट में मैंने ध्यान बंद कर दिया और अपनी ओढ़ी हुई चादर को अलग हटा दिया।
मैं दिन में भी पूरे दिन ध्यान करता रहा था तथा अब काफी रात भी हो गई थी मुझे बहुत तेज नींद भी लगी हुई थी लेकिन एक बार जब कुंडलिनी चलना शुरू हुई तो अब वह बंद नहीं हो रही थी, मैं उठ कर बैठ गया उस दिन हमारे पास पीने के लिए बीड़ी बंडल भी नहीं था मैं तुरंत ही एक बीड़ी बेचने वाले व्यक्ति को जगा कर उससे एक बंडल खरीद लाया मैंने लगातार तीन चार बीड़ी फूंक डाली मैंने आंख बंद कर पुन: देखा तो हमें दिखाई दिया कि हमारी कुंडलिनी में दृश्य चल रहे हैं,
हमारे पूरे शरीर में सन्नाटा सा छाया हुआ था हमें ऐसा महसूस हो रहा था जैसे हमने अत्यधिक भांग का नशा किया हुआ हो हमारी जान पर अटकी हुई थी घबराहट हमें दृश्य देखकर नहीं हो रही थी बल्कि हमें नींद के कारण भय हो रहा था कि कहीं मैं सो गया तो मृत्यु हमारी निश्चित है, स्वप्न में अगर मैं गाड़ी से उतर गया और बैठने का ख्याल ना रहा तब तो मरना निश्चित ही है मुझे कोई उपाय नहीं सूझ रहा था।
कुंडलिनी शुरू हो गई तो वह बंद नहीं हो रही थी हमारे पास नींद लेने तक का मौका नहीं था
मैं महामृत्युंजय का जाप करने लगा धीरे-धीरे हमारी हिम्मत बढ़ी और मैं फिर से ध्यान करने के लिए लेट गया और रात भर दृश्य देखता रहा।
सहस्त्रार चक्र की ओर से एक रेलगाड़ी मूलाधार की ओर चली आई और उसके सामने लगे दो मोटे मोटे पाइपों से तेजी से पानी निकलने लगा मुझे समझ में आया कि यह अब मूलाधार की धुलाई हो रही है।
रात जैसे तैसे गुजरी दूसरा दिन शुरू हुआ लेकिन कुंडलिनी जो एक बार शुरू हो गई थी अब विराम करने तक का समय नहीं दे रही थी हमारी नींद के कारण हालत खराब हो रही थी अपनी समस्या बताए तो किसे बताएं इसका कोई जानकार गुरु भी नहीं था जिससे अपनी बात कहें इस संबंध में पहले से कोई इस तरह की घटना मैंने किसी पुस्तक में भी नहीं पढ़ी थी ।
मुझे कुंडलिनी के वारे में पूरी तरह जानकारी भी नहीं थी तथा इस तरह की घटना घटित हो जायेगी ,मैंने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी। मै वार वार प्रार्थना
कर रहा था कि दो तीन घंटे के लिये कुंडलिनी रुक जाते तो मैं नींद लें लूं इसके वाद फिर कुंडलिनी खूब चलती रहे लेकिन कुंडलिनी नहीं रुकीं उसका चौबीस घंटे चलना जारी रहा।
पूरे दिन मैं लेटा हुआ दृश्य देखता रहा रात्रि को मैंने बहुत ही सुंदर व अद्भुत रंग-बिरंगे सर्पों के दृश्य देखे मुझे पिछली रात्रि के भय से बड़ी ही राहत महसूस हुई।
लेकिन पता नहीं क्या हुआ कि उस रात के सारे दृश्य हमारे दिमाग से डिलीट हो गए कुछ भी याद नहीं पड़ रहा है।
इस समय मैं किस चक्र में चल रहा था मुझे कुछ भी पता नहीं है।
प्रथम चक्र मूलाधार चक्र की यात्रा
अब मैं थोड़ी बहुत देर को ही अपनी बैरक से बाहर निकलता था अन्यथा लेट कर दृश्य देखता रहता था अब तो दृश्य देखने के लिए चलते फिरते भी हमें आंखें बंद करने पर दृश्य दिखाई देने लगते थे खुली आंखों के इस पार भौतिक जगत दिखाई देता था आंख बंद करने के बाद उस पार सूक्ष्म जगत दिखाई देने लगता था।
रात्रि के ध्यान में मैं एक खुली हुई छत वाली रेलगाड़ी पर यात्रा कर रहा था यात्रा में बांस बल्ली के मकान एक एक कर निकलते जा रहे थे मकानों के पीछे घने जंगल दिखाई दे रहे थे मकान के आगे महिलाएं दरवाजा दीप रहीं थीं छोटे-छोटे बच्चे खेल रहे थे इसी तरह के मकानों की लंबी लाइनें निकलती चली गई ।
प्राचीन काल के मकान महिलाएं बच्चे
, मकानों की बनावट में कोई खास परिवर्तन नहीं आया कहीं पर महिलाएं गोबर के कंडे भी पाथती दिख रहीं थीं तथा साथ में बच्चों का खेलना भी दिख रहा था।
इसके बाद महिलाओं के जल्दी-जल्दी हाथ चलने लगे बच्चों के जल्दी-जल्दी मुंह चलने लगे ऐसा लगता था जैसे वीडियो कैसेट वहुत तेज चला दी गयी हो इसीलिए उनके हाथ पैर तथा मुंह बहुत जल्दी-जल्दी चलते दिख रहे थे।
काफी देर बाद एक पक्का मकान आया उसके बरामदे में एक लड़की नाचती हुई दिख रही थी पहले वह धीरे-धीरे नाचती रही इसके बाद उसका भी नाचना बहुत तेज हो गया है तथा भद्दा लगने लगा लगता था जैसे यहां भी वीडियो कैसेट बहुत तेज चला दी गई हो, सामने पर्दे पर गोलाकार वेलनाकार पिंड भी निकलते जा रहे थे।
दोपहर के बाद ध्यान में सहस्त्रार चक्र की तरफ से एक खुली हुई रेलगाड़ी खिलौनों से भरी हुई चली आ रही थी मैंने उसमें हाथी घोड़ा जिराफ अन्य ऐसे जानवरों की मूर्तियां देखी जो जानवर इस धरती पर नहीं है इसके अलावा और भी हैरतअंगेज तरह की डिजाइन दार मूर्तियां थी। उस गाड़ी पर कोई भी आदमी नहीं दिख रहा था गाड़ी मूलाधार की ओर चली जा रही थी सभी गाड़ियां चलने का एक मुख्य रास्ता वहीं था जिस पर कीचड़ की धारा चली थी इसी मोड़दार रास्ते पर आज्ञा चक्र तक सारे दृश्य मूलाधार से सहस्रार की ओर तथा सहस्त्रार से मूलाधार की ओर चलते हुए दिखाए गए।
यह एक कुंडलिनी चलने का निर्धारित रास्ता है।
दीवाल का रहस्य
रात के समय जैसे ही मैंनें ध्यान करने के लिए अपनी आंखें बंद की तथा अपनी चादर ओढ़ ली नीचे से ऊपर की ओर पहले तो उक्त चादर धीरे-धीरे काली होती गई इसके बाद वह एकदम डिजाइन दार हो गई जबकि मैंने सफेद चादर ओढ़ी हुई थी इसके बाद पूरे परदे पर सफेद प्रकाश फैल गया सामने मैं बीच में टकटकी लगाकर देख रहा था एक आड़ी तिरछी दीवाल का रेखाचित्र हमारे सामने आ रहा था तथा हमें सामने वीच में अपनी दृष्टि लगाने में दिक्कत हो रही थी फिर मैंने उस दीवाल के ऊपर खास ध्यान दिया तो मैंने देखा कि उस दीवाल के रेखा चित्र में पहले तो हमारे सामने सीधी लंबी लंबी दीवार होती थी फिर वह हमारे सामने ही मुड़ने लगती थी। मैंनें आंखें खोलकर देखा हमारे सामने दाएं तरफ बैरक की दीवाल थी, पुन: मैंने अपनी आंखें बंद कीं वह दीवाल दाएं से बाएं ओर को मुड़ रही थी।
दीवाल का रहस्य आगे की कड़ी
अचानक हमारी समझ में दीवाल घूमने का पूरा रहस्य समझ में आ गया यह दीवाल और कुछ नहीं हमारी ही वैरक की दीवाल थी, मैं बैरक के शुरू में ही लेटा हुआ था उसके आगे बैरक दूर तक चली गई थी यहां पर केवल अकेली दीवाल नहीं घूम रही थी बल्कि पूरी बैरक ही घूम रही थी बैरक के घूमने का केंद्र बिंदु में ही था।
रेलगाड़ी का रहस्य
पूरी बैरक ही रेलगाड़ी की तरह चल रही थी कभी वह मूलाधार की ओर चली जाती इसके बाद वह मुड़कर हमारी पूर्व चली आती लेकिन मैं स्वयं भी उसमें सवार रहता तथा उसी से हमें बाहर के दृश्य दिखते। अबकी वार मैंने काफी सतर्कता पूर्वक अपने विश्वास को दृढ़ करने के लिए चलती हुई रेलगाड़ी की तरह वैरक पर अपनी दृष्टि जमाये रखा।
कब रेलगाड़ी के रूप में बैरक चलकर हमारे पास आ गई तथा मैं बैरक के भीतर हो गया हमें पता ही नहीं चला लेकिन अब की बार हमारे देखने का फोकस वैरक की छत की ओर था। यह बड़ा ही हैरान करने वाला है कि जब भी कुंडलिनी को जो दृश्य हमें दिखाना होता था हमारी दृष्टि का फोकस उधर ही सेट होता था।
मेरे सामने बैरक की छत थी लेकिन बैरक की छत बिल्कुल सफेद पुती हुई थी मगर मैं जो देख रहा था उस छत में एक डिजाइन बनी हुई थी तथा छत के हवा देने वाली पंखे की पंखुड़ियां गायब थी बाकी का बचा हुआ पंखे का भाग पर सुंदर सी प्लास्टिक चढ़ी हुई थी पंखा घूम रहा था तथा ऊपर की छत भी दाएं बाएं घूम रही थी, जब मैंने छत को दाएं बाएं घूमते हुए देखा तो मैंने उसके घूमने के चक्करों को गिनना शुरू कर दिया।
छत घूम ही रही थी कि उसके बीच में एक लोहे के सरियों की चौकोर जाली प्रकट हो गई धीरे धीरे उस जाली से एक पीला सा पदार्थ टपकने लगा। मैंने छत के घूमते हुए चक्कर को 13 बार तक गिना इसके बाद गिनना बंद कर दिया। धीरे धीरे जाली सहित छत हमसे दूर होती गई इसका अर्थ था की बैरक मुड़कर वापस जा रही है।
*दौड़ते मकान*
हमें स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि यह कोई रेलगाड़ी नहीं थी बल्कि लंबे चौड़े मकान दौड़ रहे थे हमें एक लंबी चौड़ी बिल्डिंग दिखाई थी लगता था कि यह किसी सरकारी विभाग का मुख्यालय था बिल्डिंग के बरामदे में बहुत से लोग आ जा रहे थे अचानक पता नहीं क्या हुआ कि सभी लोग बदहवास होकर तेजी से दौड़ने लगे इसके बाद वह बिल्डिंग हम से आगे निकल गई।
बिल्डिंग में लगे फोटोग्राफ से आगे कड़ी
बिल्डिंग के पीछे हमने बहुत से लोगों के फोटोग्राफ चिपके हुए देखें यह फोटोग्राफ उसी तरह के थे जैसे कि आकाश से फोटोग्राफ्स की बरसात हुई थी।
हाथ में गदा लिए हुए देवता
दृश्य बदला , हरे भरे खेत दिखाई दे रहे थे, खेतों के किनारे चार पांच व्यक्तियों का एक झुंड घूम रहा था एक पगडंडी पर दो तीन व्यक्ति चले जा रहे थे। यह अभी प्रथम चक्र ही चालू था। हमें अपनी ही बैरक का बरामदा दिखाई दिया , बरामदे में एक बहुत लंबा सा आदमी उस की वेशभूषा देवताओं जैसी थी वह सिर पर मुकुट धारण किए हुए था तथा हाथ में एक गधा लिए हुए चला जा रहा था उस देवता ने हमारी तरफ मुड़कर भी नहीं देखा मैंने सोचा कि यह हनुमान जी तो नहीं है मैंने उनकी पूछ की तरफ देखा मगर उनके पूछ नहीं थी मैं अंदाज नहीं लगा पाया कि यह कौन सा देवता था। धीरे-धीरे वह देवता आग को चला गया।
मूलाधार चक्र की प्रिंटेड कागज की रील
दृश्यों के अलावा बीच-बीच में कई प्रकार के आकाशीय गोलाकार , वेलनाकार पिन्ड तथा अन्य प्रकार की संरचनाएं भी गुजर जाती थी। प्रथम चक्र शुरू होने के तीसरे दिन सुबह अचानक ऊपर की ओर से
दो से 3 इंच चौड़ी एक कागज की रील निकलती चली आ रही है उस पर नीचे की ओर प्रथम मूलाधार चक्र का चार पंखुड़ियों वाला लाल रंग का चक्र छपा हुआ था इसके बाद ऊपर की तरफ 2 देवियों की फोटोग्राफ छपे हुए थे। जब चक्र और देवियों की फोटो आ गई तो मैंने समझा कि अब मूलाधार चक्र पूरा हो गया है।
पीली रंग की निकलती स्प्रिंग
मैंने विचार किया कि मूलाधार चक्र तो पूरा हो ही गया है थोड़ा सा इसके आगे और देख लूं हमारे देखते ही देखते अचानक एक पीले रंग की स्प्रिंग जैसी संरचना निकलने लगी वह स्प्रिंग पहले बेगरे (गैप दार) छल्लों वाली थी, धीरे-धीरे उसके छल्ले घने होते गए। दृश्य देखते देखते मैं बहुत थक गया था इसलिए मैंने दृश्य देखने बंद कर दिये।
स्वाधिष्ठान चक्र की यात्रा
मैंने पुन: जब दृश्य देखने चालू किए तो मैं सोच रहा था कि हमें फिर से पीली स्प्रिंग वाले दृश्य दिखाई देंगे मगर अफसोस कि वह दृश्य निकल चुके थे क्योंकि कुंडलिनी में वीडियो लगातार चालू थे मैं पश्चाताप करके रह गया।
आगे की दृश्य बताने से पहले
कुंडलिनी के बारे में कुछ खास जानकारियां। नंबर 1
जब मूलाधार से कीचड़ की धारा निकलकर मस्तक से होती हुई जमीन पर गिरी तथा जमीन पर चलते हुए जिस रास्ते पर गई वह रास्ता ही कुंडलिनी चलने का मुख्य तथा निर्धारित रास्ता है उसी रास्ते से चलते हुए सारे दृश्य दिखाई देते हैं।
नंबर दो
मस्तक पर दृश्य बाएं से दाएं तथा दाएं से बाएं तरफ को चलते हैं मस्तक के वाएं तरफ सहस्त्रार चक्र है तथा दाएं तरफ मूलाधार चक्र है।
नंबर 3
जब वाई ओर से दाई ओर को कुंडलिनी के दृश्य चलते हैं अर्थात कुंडलिनी चलती है तो साधक भी कुंडलिनी चलने की दिशा में दाएं तरफ धीरे-धीरे घूमता जाता है
कुंडलिनी मूलाधार की तरफ जा कर दृश्टि से ओझल हो जाती है साधक का मुंह उत्तर पश्चिम के कोने में ठहर जाता है, जब कुंडलिनी मूलाधार की तरफ से पुन: मुड़ कर वापस आती है तो साधक का मुंह फिर से उत्तर से पश्चिम की ओर घूमते हुए पश्चिम दक्षिण के कोने में ठहर जाता है जबकि कुंडली सहस्त्रार की ओर चली जाती है। इसी प्रकार साधक का अपनी धुरी पर घूमना जारी रहता है।
स्वाधिष्ठान चक्र की यात्रा में आगे की कहानी
ध्यान करने के लिए ज्यों ही मैं लेट कर सफेद चादर ओढ़ता हूं वैसे ही नीचे की तरफ पैरों की ओर से चादर का रंग धीरे-धीरे काला होता चला जाता है, इसके बाद प्रतिदिन की तरह ही चादर की डिजाइन पूरी तरह बदल जाती है चादर की डिजाइन प्रतिदिन ही नई नई आती हैं।
हमारे ऊपर चावलों का फेंका जाना
चादर के बाद दृश्य बदलता है आकाश में एक घूमता हुआ टेबल फैन जैसा प्रकट हो जाता है उस की पंखुड़ियां तेजी से घूम रही हैं घूमते घूमते ही वह पंखा अचानक एक लकड़ी की बुनी हुई डलिया में परिवर्तित हो जाता है उस डलिया से हमारे ऊपर चावल फेंक दिए जाते हैं, चावल गिरते ही जमीन से हवा के छोटे-छोटे बुलबुले निकलकर वायुमंडल में तैरने लगते हैं इसके बाद उक्त दृश्य गायब हो जाता है।
कुंडलिनी के साथ घूमता ग्राउंड तथा मेला जैसा दृश्य उपस्थित होना
मूलाधार की तरफ से कुंडलिनी एक रेलगाड़ी के रूप में चली आ रही है गाड़ी के चलने से हमारे सामने वाला ग्राउंड तेजी से गाड़ी के दिशा में दाएं से बाएं और को घूमने लगता है घूमते घूमते ही अचानक मेला जैसा दृश्य उपस्थित हो जाता है, उसी ग्राउंड के बीच में एक बड़ा सा तंबू बनने लगता है, इसके बाद उस तंबू के ऊपर रंग बिरंगी छतरिया लगने लगती हैं लेकिन यह सब कोई आदमी नहीं लगाता है बल्कि सारा काम अपने आप ही ऑटोमेटिक रूप से होता है।
इसके बाद सामने एक दरवाजा दिखता है दरवाजे की नीचे से एक चौकोर डंडाकृति ब ट्यूबलाइट जैसी आकृति सफेद रंग का प्रकाश तथा फुलझड़ियां छोड़ते हुए ऊपर दरवाजे की चौखट तक पहुंच कर गायब हो जाती है आगे का दृश्य फिर बदल जाता है।
।
Comments
Post a Comment