क्या आपने कभी मॉल जैसे सार्वजनिक स्थानों पर वॉकिंग मेडिटेशन किया है? यदि हां, तो आपका अनुभव कैसा था?
मैंने सार्वजनिक स्थानों पर टहलते हुए ध्यान तो नहीं किया है लेकिन जब हमारी कुंडलिनी जागृत हो गई तो उसके बाद वह 24 घंटे चलने लगी। 24 घंटे चलने का अर्थ है कि कुंडलिनी के दृश्य लगातार 24 घंटे दिखाई देने लगे। कुंडलिनी जागृत होने के बाद लगातार 3 महीने तक उसके दृश्य दिखना जारी रहे। ऐसी अवस्था में हमें कई बार इधर-उधर जाना भी पड़ा।
सार्वजनिक स्थानों पर चलते हुए भी जब मैंने अपनी आंखें बंद की तो कुंडलिनी के दृश्य चल रहे थे। उस समय ऐसा लग रहा था जैसे की हमारे मस्तिष्क में कोई फिल्म प्रोजेक्टर रखा हुआ है और उसे कोई भीतर बैठा हुआ चला रहा है जिसके दृश्य हमें दिखाई दे रहे हैं। ऐसा हमें लगातार 3 महीने तक दिखा।
जब मैं गाड़ी पर बैठा मैंने खिड़की की तरफ देखा तो हमें खिड़की के बगल में हमारी गाड़ी की तरह ही एक अन्य गाड़ी भी साथ-साथ चलती हुई दिखाई दे रही थी लेकिन जैसे ही मैंने खिड़की से नजर हटाकर गाड़ी की दीवाल पर डाली, तो गाड़ी की दीवाल पर एक अन्य गाड़ी चलती हुई दिखाई देने लगी यह चित्र उसी तरह बन रहा था जैसे की फिल्म के परदे पर प्रोजेक्टर द्वारा चित्र बनता है।
केवल टहलते हुए आंखें बंद करने पर भी चित्र दिखाई देते हैं इस तरह के कई चित्र मैंने देखे हैं जो कि हमें लगातार 3 महीने तक दिखाई देता रहे।
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